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________________ १५८ ग्रन्थराज श्री पञ्चाध्यायी तस्मादनुपादेयो व्यवहारोऽतगुणे तटारोपः । इष्टफलाभावादिह न नयो वर्णादिमान यथा जीवः ॥ १६ ॥ अर्थ-इसलिये जिस वस्तु में जो गुण (भाव) नहीं है उस वस्तु में उन गुणों का आरोप करने रूप व्यवहार उपादेय नहीं है क्योंकि ऐसे व्यवहार से इष्ट फल (सम्यग्ज्ञान ) की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिये जीव को वर्णादिवाला कहना नय नहीं है किन्तु नयाभास है क्योंकि इससे उल्टी मिथ्यात्व की पुष्टि होती है। भावार्थ-शंकावार ने मार रहा था कि जीन को वर्णादिमान् कहना इसको असद्भुत व्यवहार नय कहना चाहिये। ग्रन्थकार कहते हैं कि यह नय नहीं किन्तु नयाभास है। क्योंकि जीव के वर्णादि गुण नहीं हैं फिर भी उन्हें जीव के कहने से जीव और पुद्गल में एकत्व बुद्धि होने लगेगी। यह इष्ट फल की हानि है। शंका ननु चैवं सति जियमादुक्तासद्भूतलक्षणो न नयः । भवति नयाभासः किल क्रोधादीनामतगुणारोपात् ।। १६॥ शंका-ऐसा होने पर तो (अर्थात् यदि एक वस्तु के गुण दूसरी वस्तु में आरोपित करने का नाम नयाभास है तो ऐसा मानने से जो ऊपर ( ५२९ में ) असद्भूत व्यवहार नय कहा गया है उसे भी नय नहीं कहना चाहिये किन्तु नयाभास कहना चाहिये। कारण क्रोधादिक जीव के गुण नहीं हैं फिर भी उन्हें जीव के कहा गया है। यह भी तो अतद्गुणारोप ही है। इसलिये आप (ग्रंथकार)का कहा हुआ भी असद्भूत व्यवहार नय नयाभास ही है? । भावार्थ-शंकाकार का कहना है कि जिस प्रकार अतदगणारोप से आप क्रोधादि को जीव का कहकर नय कहते हैं उसी प्रकार मैं वर्णादि को जीव का कहकर नय कहता हूँ। यदि आपका सम्यक् नय है तो मेरा भी सम्यक् नय है। यदि मेरा नयाभास हैं तो आपका भी नयाभास होना चाहिये? समाधान नैवं यतो यथा ते क्रोधाद्या जीवसंभवा भावाः । न तथा पुदगलवपुषः सन्लि च वर्णादयो हि जीवस्य || ५६५॥ अर्थ-शंकाकार का उपर्युक्त कहना ठीक नहीं है क्योंकि जिस प्रकार क्रोधादिक भाव जीव में उत्पन्न होते हैं अथवा जीव के हैं। उस प्रकार पुद्गलमय वर्णादिक जीव के भाव नहीं हैं। भावार्थ-पुद्गल कर्म के निमित्त से आत्मा के चारित्र गुण का जो विकार है उसे ही क्रोध, मान,माया लोभादिक । के नाम से कहा जाता है। इसलिये क्रोधादिक आत्मा के ही वैभाविक भाव हैं। अतः जीव में उनको आरोप करना अतद्गुणारोप नहीं कहा जा सकता किन्तु तद्गुणारोप ही है। वे भाव शुद्धात्मा के नहीं है किन्तु पर के निमित्त मात्र से होते हैं इसलिये उन्हें असद्भूत नय का विषय कहा जाता है। चाहे सद्भूत हो अथवा असद्भूत हो तद्गुणारोपी ही नय है अन्यथा वह नयाभास है। रूप रस गन्धादिक पुद्गल के ही गुण हैं, वे जीव के किसी प्रकार नहीं कहे जा सकते हैं। रूप रसादि को जीव के भाव कहना, यह अतद्गुणारोप है इसलिये यह नयाभास है। पुनःभावार्थ-ऊपर कही हुई शंका ठीक नहीं है कारण कि वे क्रोधादिक भाव तो जीव में होने वाले औदयिक भाव रूप हैं इसलिये वे जीव के तद्गुण हैं और वे जीव के नैमित्तिक भाव होने से उनको सर्वथा पुद्गल के नहीं कह सकते पर जो जीव को वर्णादि वाला कहने में आवे वहाँ तो वर्णादिक सर्वथा पुद्गल के ही होने से वे जीव के किस प्रकार हो सके? तथा क्रोधादिकभाव को जीव का कहने में तो यह प्रयोजन है कि परलक्ष से होने वाले क्रोधादिभाव क्षणिक होने से और आत्मा का स्वभाव नहीं होने से वे उपादेय नहीं है इसलिये उनको टालना चाहिये, ऐसा सम्यग्ज्ञान होता है इसलिये क्रोध को जीव का कहना-इसमें तो उपर्युक्त सम्यक् नय लागु पड़ सकता है परन्तु जीव को वर्णादि वाला कहने में तो कुछ भी प्रयोजनकी सिद्धि नहीं हो सकती है। इसलिये जीव को क्रोधादिवाला कहने वाले असद्भुत व्यवहार नय में तो नयाभासपने का दोष नहीं आता है पर जीव को वर्णादिवाला कहने में तो एकत्वबुद्धि का दोष आता है। अत: वह नयाभास है।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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