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________________ प्रथम खण्ड/तृतीय पुस्तक १५१ में भ्रम हुआ हो तो इस नय के जानने पर वह दोष तथा वह भ्रम दूर हो जाता है। यहाँ पर अविनाभाव होने से सामान्य साध्य है तथा विशेष उसका साधक है अर्थात् ज्ञान साध्य है और घटज्ञान पटज्ञान आदि (विकल्पात्मकज्ञान ज्ञेयाकार ज्ञान) उसका साधक है अर्थात् गुण साध्य है पर्याय सायक है। दोनो अविनाशाद है। भावार्थ-कोई पदार्थ के स्वरूप को नहीं समझने वाले ज्ञान को घटपटादि पदार्थों का धर्म बतलाते हैं तथा कोई कोई ज्ञेय के धर्म ज्ञायक में बतलाते हैं। अथवा विषय विषयी के सम्बन्ध में किन्हीं को भ्रम हो रहा है। उन सबका अज़ान दूर करना ही इस नय का फल है। इस नय द्वारा यही बात बतलाई गई है कि विकल्पता ज्ञान का साधक है अर्थात् घटज्ञान, पटज्ञान, केवलज्ञान इत्यादि ज्ञान के विशेषण साधक हैं। सामान्य ज्ञान साध्य है। उपर्युक्त विशेषणों से सामान्य ज्ञान की ही सिद्धि होती है। ज्ञान में घटादि धर्मता सिद्ध नहीं होती। ऐसा यथार्थ परिज्ञान होने से ज्ञेय ज्ञायक में संकरता का बोध कभी नहीं हो सकता है। सम्यग्दर्शन का विषय सामान्य ज्ञान है, पर अनुभव में तो विशेष ज्ञान आता है। सामान्यविशेष ज्ञान का अविनाभाव होने से ज्ञानी इस नय द्वारा सामान्य ज्ञान को साध्य बना लेते हैं और विशेष ज्ञान को साधन बना लेते हैं और अपने इष्ट की सिद्धि कर लेते हैं। श्री द्रव्यसंग्रह में कहा है अचदुणाणदेसणसामण्णं जीवलक्रवर्ण भणियं । वहारा सुद्धणया सुद्धं पुण दंसणं णाणं ॥६॥ इसमें आठ प्रकार के ज्ञान और चार प्रकार के दर्शन को (विशेष ज्ञान दर्शन को-पर्याय को) इसी व्यवहार नय से जीव का लक्षण कहा है। यही साधन है और शुद्ध ज्ञान और शुद्ध दर्शन (सामान्य ज्ञान दर्शन गुण) जो शुद्ध नय ( निश्चय नय) का विषय है वह साध्य है। अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नय का वर्णन (५४६ से ५४८ तक) अनुपचारित असद्भूत व्यवहार नय का लक्षण । अपि नाऽसद्भूतो योऽनुपचरिताख्यो नयः स भवति यथा । कोधारा जीवस्य हि वितक्षिताश्वेटबुद्विभवाः ||५५६। अर्थ-जो अबुद्धिपूर्वक होने वाले [ वर्तमान बुद्धि (ज्ञान) में नहीं पकड़ में आने वाले अव्यक्त ] कोधादिक भाव जीव के विवक्षित किये जायें तो जो अनुपचरित नाम का असद्भूत नय है वह हो जाता है अर्थात् अबुद्धिपूर्वक राग को जीव का कहना अनुपचरित असद्भूत व्यवहार नय का लक्षण है। इस नय से अबुद्धिपूर्वक राग को जीव का कहना टीक है। कभावों को जीव के कहना यह असदभत व्यवहार नय है यह पहले ५२९ में कह आये हैं। ये कोधादिक भाव दो प्रकार के होते हैं - (१) अवुद्धिपूर्वक (अव्यक्त),(२) बुद्धिपूर्वक ( व्यक्त ) उसमें अबुद्धिपूर्वक भावों को जीव के कहना अनुपचरित है और बुद्धिपूर्वक को जीव के कहना उपचरित है ये आगे कहेंगे। यहाँ पर वैभाविक भावों को जीव का कहना इतना अंश तो असद्भूत का है।गुण-गुणी का भेद व्यवहार अंश है। अबुद्धिपूर्वक क्रोधादिकों को कहना इतना अंश अनुपचरित का है क्योंकि साधक जीव का ज्ञान उनको जुदा पकड़ नहीं सकता है। अनुपरित असद्भूत व्यवहार नय की प्रवृत्ति में कारण कारणमिह यस्य सतो या शक्तिः स्याद्विभावभावमयी । उपयोगटशाविशिष्टा सा शक्तिः स्यात्तदाप्यनन्यमयी ॥ ५॥७॥ अर्थ-इस नय की प्रवृत्ति में कारण यह कि जिस पदार्थ की जो शक्ति विभावमयी है और उपयोगदशा विशिष्ट है अर्थात् विभावरूप कार्य कर रही है उस समय वह शक्ति अपने द्रव्य से ही अनन्यमयी ( एकमेक-अभिन्न )है। ऐसा कहा जाता है। ___ भावार्थ-यह व्यवहार अनुपचारित इसलिये कहलाया क्योंकि क्रोध चारित्र नामक निज गुण की ही विभाव दशा है। इन क्रोधादिकों की प्रवृत्ति के समय जीव और क्रोधादिक में अनन्यभाव प्रतीत होने लगता है और अभिन्नता का व्यवहार होने लगता है। यह इस नय की प्रवृत्ति में कारण है।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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