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________________ (२२) पृष्ठ संख्या ४४० से ४४३ ४४३ से ४५४ ४५४ से ४५५ ४५६ ४५६ से ४६१ विषय सूत्र संख्या समाधान सूत्र १६१५ से १६२४ शंका : सम्यग्दृष्टि का किसी बाहरी पदार्थ में उपयोग होता है या नहीं? १६२५ शंका समाधान व उपसंहार १६२६ से १६६३ शंका पुनः : (शंकाकार सम्यग्दृष्टि के लब्धि रूप ज्ञान चेतना तो मानता है पर उसके उपयोग रूप ज्ञान चेतना नहीं मानता)? १६६४ से १६६५ समाधान १६६६ से १६६७ शंका : सम्यक्व को आगम में किस कारण से सविकल्प माना है? १६६८ समान दूर १६६९ से १६८७ पुनः शंका १६८८ से १६८९ समाधान १६९० से १६९७ उपसंहार १६९८ से १७०३ पूर्व सूत्रों से अनुसंधानित १७०४ से १७०६ प्रश्न व उत्तर (छठी पुस्तक के ) २४३ से २८० द्वितीय खण्ड/सालती पुस्तक सूत्र १७०७ से १७०९ भूमिका १७०७ से १७२६ औदयिक आदि पांच भावों का सामान्य निरूपण १७२७ से १७४० गति औदयिक भाव १७४१ से १८२० कषायें व उनके भेद ९८२१ से १८३९ भावलिंग के भेद, कारण तथा औदयिकपने की सिद्धि १८४० से १८६३ मिध्यादर्शन औदयिक भाव १८६४ से १८६६ अज्ञान औदयिक भाव १८६७ से १८८० असंयम औदयिक भाव १८८१ से १९०५ असिद्धत्व औदयिक भाव है १९०६ से १९०८ लेश्या औदयिक भाव है १९०९ प्रश्नोत्तर २८१ से २९१ ४६२ से ४६३ ४६४ से ४६५ ४६५ से ४६६ ४६६ से ४७१ ४७२ से ४८१ ४८१ से ४८४ ४८४ से ५०४ ५०५ से ५११ ५११ से ५१६ ५१६ से ५२१ ५२१ से ५२४ ५२४ से ५३४ ५३४ से ५३५ ५३५ से ५३८ ५३८ से ५४०
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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