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________________ विषय (ग) देव मूढ़ता (घ) धर्म मूढ़ता (च) गुरु मूढ़ता (छ) देव (अरहन्त सिद्ध) का स्वरूप (ज) गुरु का सामान्य स्वरूप (झ) आचार्य गुरु का स्वरूप (त) उपाध्याय गुरु का स्वरूप (थ) साधु गुरु का स्वरूप (द) गुरुओं में परस्पर विशेषता (ध) धर्म का सामान्य स्वरूप (न) गृहस्थ धर्म का स्वरूप (प) मुनिधर्म का स्वरूप व उपसंहार (फ) निश्चयधर्म का स्वरूप (ब) अमूढ़ दृष्टि अंग का उपसंहार नववाँ अवान्तर अधिकार उपबृंहण अंग का स्वरूप दसवाँ अवान्तर अधिकार स्थितिकरण अंग का स्वरूप ग्यारहवाँ अनान्तर अधिकार वात्सल्य अंग का वर्णन बारहवाँ अवान्तर अधिकार प्रभावना अंग का वर्णन उपसंहार परिशिष्ट विषय- परिचय सम्यग्दर्शन में सविकल्प निर्विकल्प भेद नहीं है शंका समाधान भूमिका समाधान सूत्र भूमिका उपसंहार ( २१ ) सूत्र संख्या १३६३ से १३६७ शंका: यदि आपका यह कहना है कि सम्यग्दृष्टि के ज्ञान का एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में गमन होता रहता है तो क्या आत्मा से भिन्न -दूसरा पदार्थ भी ज्ञान चेतना होता है? १३६८ १३६९ से १३७० १३७१ से १३८७ १३८८ से १४१२ १४१३ से १४२६ १४२७ से १४३४ १४३५ से १४४२ १४४३ से १४८२ १४८३ से १४९० १४९१ से १५१० १५११ से १५१४ १५१५ से १५४० १५४१ से १५४२ १५४३ से १५५४ १५४३ से १५५४ १५.५ मे १५७० १५५५ से १५७० द्वितीय खण्ड / छठी पुस्तक १५७१ से १५७६ १५७१ से १५७६ १५७७ से १५८५ १५७७ से १५८५ १५८६ से १५८८ १५८९ से १७०३ १५८९ से १५९४ १५९५ से १५९८ १५९९ से १७०३ १५१९ से १६१० १६११ से १६१३ १६१४ पृष्ठ संख्या ३८३ ३८३ ३८३ ३८४ से ३८६ ३८६ से ३८९ ३८९ से ३९९ ३९१ से ३९२ ३९२ से ३९३ ३९३ से ३९९ ३९९ से ४०० ४०० से ४०२ ४०३ ४०४ से ४०७ ४०७ से ४०८ ४०८ से ४११ ४०८ से ४११ ४११ से ४१४ ४११ से ४१४ ४१४ से ४१५ ४९४ से ४१५ ४१५ से ४९८ ४१५ से ४१८ ४१७ से ४१८ ४१८ से ४३० ४३१ से ४३२ ४३१ से ४६५ ४३२ से ४३३ ४३३ से ४३४ ४३४ से ४६५ ४३४ से ४३८ ४३८ से ४३९ ४३९
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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