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________________ प्रथम खण्ड/तृतीय पुस्तक १४१ अथ ताथा तथा सत् सन्मानं मन्यमान इह कश्चित् ।। न विकल्पमतिक्रामति सदिति विकल्पस्य दुर्निवारत्वात् ॥ ५११॥ अर्थ-जितना भी नय है वह विकल्यात्मक है इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है कि यहाँ सत् को सत् मात्र मानता हुआ भी कोई विकल्प को उलंघन नहीं करता है क्योंकि सत् के विषय में 'सत्' इस विकल्प का निवारण करना कठिन है। भावार्थ-कोई यह कहे कि चलो हम पदार्थ की भेदरूप श्रद्धा नहीं करते। हम तो अखण्ड अभेद सत् को श्रद्धा करेंगे, तो कहते हैं कि सत्को सतमात्र'श्रद्धान करने में भी सत्' इतना विकल्प तो फिर भी है। इसलिये नय विकल्प तो फिर भी खड़ा है। वह बिना अनुभव दर्निवार ही है। स्थूल वा सूक्ष्म वा बाह्यान्तर्जल्पमात्रवर्णमयम् । ज्ञानं तन्मयमिति वा नयविकल्पो वाग्विलासत्वात् ।। ५१२ ।। अर्थ-इसी प्रकार स्थूल बाह्य विकल्प (स्पष्ट बोलमा) और सूक्ष्म अन्तर्जल्प ( मन ही मन में बोलना)जितना भी विकल्प है वह सब वर्णमय है और वह नय रूप है क्योंकि वह वचन विन्यास रूप है। जितना भी वचनात्मक कश्चन है सब नयात्मक है तथा उन वचनों का जो बोध है-ज्ञान है वह भी नय रूप ही है क्योंकि वचनों के समान उसने भी वस्तु के विवक्षित अंश को ही विषय किया है और राग को लिये हुये है। भावार्थ-वाचक तथा वाच्य बोध - दोनों ही नयात्मक हैं। सत् को समझने के लिये सूक्ष्म से सूक्ष्म तक जितना भी वचनाश्रित विकल्प भेद है। वह मन नय है। अवलोक्य वस्तुधर्म प्रतिनियतं प्रतिविशिष्टमेकैकम् । संज्ञाकरणं यदि वा तद्वागुपचर्यते च नयः ॥ ५१३॥ अर्थ-अपनी-अपनी विशेषता को लिये हुये प्रतिनियत एक-एक वस्तु के धर्म को देखकर जो उसका वैसा नाम रखना है अथवा उसका उच्चारणात्मक वचन है वह सब नय से उपचार किया जाता है। भावार्थ-(१)अग्नि को छूकर देखा तो कह दिया 'अग्नि गरम है' अग्नि से खाना पकाते देखा तो कह दिया 'अग्नि पाचक है। अग्नि से प्रकाश होते देखा तो कह दिया 'अग्नि प्रकाशक है। इत्यादि अग्नि अनन्त रूप है। यह जितना अग्नि का नाम रखना या कहना या विकल्प करना सब बचन विलास है और वह वचन विलास नय रूप से लोक में तथा आगम में उपचार किया जाता है (प्रसिद्ध है)।अग्नि तो जो है सो है वह निर्विकल्प है और अनुभव गम्य है ।(२)इस प्रकार आत्मा को जानते हुये देखकर'ज्ञानी' कहना, देखते हुये देखकर दुशी' कहना।रमण करते देखकर चारित्री कहना इत्यादिक-आत्मा का नाम रखना या कहना या विचारना सब नय विकल्प जाल है। हेय है। आत्मा तो जो है सो है। निर्विकल्प है। अनुभव गम्य है। पर उस अनुभव गम्य आत्मा का ज्ञान कराने का और कोई साधन नहीं है। अथ तद्यथा यथाग्नेरोष्ण्यं धर्मं समक्षतोऽपेक्ष्य । उष्णोऽग्निरिति वागिह तदज्ञानं वा नयोपचार: स्यात् ॥ ५१४॥ अर्थ-जैसे अग्नि का उष्ण धर्म सामने देखकर किसी ने कहा कि 'अग्नि उष्ण है' यह वचन नय रूप है और उस वचन का वाच्य रूप बोध भी नयात्मक है। इह किल छिदानिदानं स्यादिह परशु स्वतन्त्र एव यथा । ज तथा जयः स्वतन्यो, धर्मविशिटं करोति वस्तु बलात् ।। ५१५॥ अन्वय-यथा इह किल परशु स्वतन्त्रः एव छिदानिदानं स्यात् तथा नयः स्वतन्त्रः(छिदानिदानं न स्यात किन्तु सः नयः) वस्तु बलात् धर्मविशिष्टं करोति। अर्थ-जैसे यहाँ जगत में कुलहाड़ा स्वतन्त्र ही भेद का कारण होता है। उस प्रकार नय स्वतन्त्र होकर वस्तु के भेद (टुकड़े करने ) का कारण नहीं है किन्तु वह तो वस्तु को बलपूर्वक धर्म सहित करता है अर्थात् नय गुण गुणी का भेद (खंड ) नहीं करता किन्तु अभेद करता है।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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