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________________ १४२ ग्रन्थराज श्री पञ्चाध्यायी भावार्थ-वस्तु में अनन्त धर्म होने से तथा शब्द में रामापत सब धर्मों का प्रतिपादन करने की शक्ति नहोने से, वस्तुगत एक-एक विशेष-विशेष धर्म की अपेक्षा करके कहने वाला वचन या विकल्परूप नय उस वस्तु को उस धर्म सहित निरूपण कर देता है। यही नय का कमाल है। वह एक-एक धर्म को वस्तु से भिन्न नहीं करता किन्तु वस्तु को उस धर्म से युक्त करता है। जैसे ऊपर के दृष्टान्त में अग्नि को उध्या कहा था यह नय उष्णता को अग्नि से परशुवत् भिन्न नहीं करना किन्तु अग्नि उष्णतामय है इस प्रकार अग्नि को उष्णता से विशिष्ट करता है। सब नय इसी प्रकार वस्तु को अपने-अपने धर्म से विशिष्ट करते हैं। अत:वस्तु अनन्तधर्मात्मक सिद्ध हो जाती है। फिर प्रमाण के अनन्तधात्मक वस्तु का युगपत बोध हो जाता है। ५०३ से ५१५ तक का सार हम ऊपर कह चुके हैं कि नय का कार्य केवल वस्तु को समझाना है और समझना-समझाना बिना भेद किये नहीं हो सकता। अतः वस्तु का अनुभवी आचार्य शिष्य को वस्तु पकड़ाने के लिये नयों द्वारा भेद-प्रभेद करता चला जाता है पर आशय उसका अभेद को ही पकड़ाने का है और शिष्य भी भेद-प्रभेद करके पकड़ता है पर आशय शिष्य का भी अभेद को ही पकड़ने का है। तो कहते हैं कि नय यद्यपि शब्दों में वस्तु को खण्ड-खण्ड कर देता है पर इससे यह नहीं समझ लेना चाहिये कि वस्तु भी उस प्रकार खण्ड-खण्ड हो गई जैसे परशु से लकड़ी खण्ड-खण्ड हो जाती है किन्तु नय तो एक-एक धर्म को भेद करके वस्तु को अनन्त धर्मों से विशिष्ट करता है अर्थात् अनन्तधर्मात्मक एक वस्तु सिद्ध करता है। समझने-समझाने के बाद यह सब नय जाल निरर्थक है। अत: श्रीसमयसारजी में इसी को व्यवहार या म्लेच्छ भाषा कहा है।म्लेच्छों में धर्म नहीं है उसी प्रकार नय जाल( व्यवहार) में धर्म नहीं है। आर्य (निश्चय) में धर्म है अर्थात् अखण्ड आत्मानुभव में धर्म है। धर्म नयातीत है। (आगे देखिये ६४५ से ६५३ तक) नोट-यहाँ तक वचनात्मक(द्रव्यनय) और ज्ञानात्मक विकल्प( भावनय)दोनोंकानिरूपण किया। इसमें इतना विवेक और रखने की आवश्यकता है कि शब्द को तो उपचार से ही नय कहते हैं। आत्या में जो विकल्प है वही वास्तव में नय है। क्योंकि नय आत्मा की पर्याय है पुद्गल की नहीं और आत्मा में भी वह भाव नय अपरामार्थभूत है कोई वास्तविक वस्तु नहीं है। वह तो उन्मज्जत निमजत होनेवाली चीज है। आगन्तुक भाव है। आस्रव तत्व हैं। अथवा विकल्यात्मक ज्ञान है। अनुभव में नय का उदय नहीं है। नय का सामान्य कथन पूरा हुआ। दूसरा अवान्तर अधिकार व्यवहार नय तथा उसके भेद-प्रभेदों का निरूपण नय के मूल भेदों का कथन ५१३ से ५२० तक एकः सर्वोऽपि नयो भवति विकल्याविशेषतोऽपि नयात् । अपि च द्विविध: स यथा स्वविषयभेदे विकल्पद्वैविध्यात || ५१६॥ अर्थ-विकल्प सामान्य की अपेक्षा सभीनय एक है क्योंकि जो भी नय होगा वह विकल्यात्मक ही होगा तथा अपने विषय में भेद होने से विकल्प दो प्रकार का होता है। अतः नय के भी दो भेद हो जाते हैं। _एको द्रव्यार्थिक इति पर्यायार्थिक इति द्वितीयः स्यात् । सर्वेषां च नयानां मूलमिवेद नयद्वयं यावत् ॥ ५१७॥ अर्थ-एक द्रव्यार्थिक नय और दूसरा पर्यायार्थिक नय है। ये दो नय सब नयों के मूलश्रोत हैं। द्रव्यार्थिक नय का निरुक्ति - अर्थ द्रव्यं सन्मुख्यतया केवलमर्थः प्रयोजनं यस्य । भवति द्रव्यार्थिक इति नयः स्वधात्वर्थसंझकरबैकः ॥ ५१८॥ अर्थ-द्रव्य अर्थात् सत् केवल वह ही मुख्यता से जिसका अर्थ अर्थात् प्रयोजन (विषय) हो वह द्रव्यार्थिक नय है। यह अपनी धातु के अर्थ के अनुसार यथार्थ नाम धारक है और यह एक ही होती है। (इसके भेद नहीं होते।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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