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________________ प्रथम खण्ड /द्वितीय पुस्तक सत्यं तत्र निदानं किमिति तदन्तेषणीयमेव स्यात् । येनारवण्डितमिव सत् स्याटेकमलेकदेशवत्वेऽपि || ६३ ॥ अर्थ - एक पदार्थ के प्रदेश जैसे अखण्ड होते हैं वैसे एक क्षेत्रावगाही अनेक पदार्थों के नहीं होते - आपका यह कहना तो ठीक है परन्तु जिससे कि अनेक प्रदेशवाला होने पर भी आपको सत् एक अखण्ड सा प्रतीत होता है इसका क्या कारण है वह (कारण ही) पहले आप बतलाइये। भावार्थ - ग्रन्थकार शंकाकार से यह जानना चाहते हैं कि वह किस कारण से अनेक प्रदेशी सत् को अखण्ड एक कहता है ताकि उसके कारण का खोटापन उसे समझा सकें। ननु तत्र निदानमिट परिणममाने यदेकदेशेऽरय । वेणोरित पर्वसु किल मलिन मादेषु । अर्थ - शंकाकार उत्तर में कहता है कि सत् अनेक प्रदेशवाला होकर भी जो अखण्डित प्रतीत होता है उसमें कारण यह है कि इस सत के एक देश में परिणमन*(संकोचविस्तार हलन-चलन) होने पर सब देश में परिणमन (हलनचलन) होता है जैसे बांस की एक पोरी के हिलने पर सब पोरियों में हलन-चलन होता है। यही इसके अखण्डित्व की युक्ति है। तन्न यतस्तग्राहकमिव प्रमाणं च नास्त्यदृष्टान्तात् । केवलमन्वयमात्रादपि वा व्यतिरेकिणश्च तदसिद्धेः ॥ ४६५ ॥ अर्थ - एक देश हिलने से सब देशों में हिलना एक वस्तु की अखण्डता में कारण नहीं हो सकता क्योंकि इसका साधक कोई प्रमाण नहीं है और प्रमाण इसलिये नहीं है कि उसका कोई अन्वय व्यतिरेक साधक दृष्टान्त नहीं है। यदि उपर्युक्त कथन ( एक देश में हिलने से सब देश में हिलना होता है) में अन्वय व्यतिरेक दोनों घटित होते हों तब तो उसकी सिद्धि हो सकती है अन्यथा केवल अवयमात्र या केवल व्यतिरेक मात्र से उक्त कथन की सिद्धि नहीं हो सकती। ननु चैकरिमन देशे करिमश्चित्वन्यतरेऽपि हेतुवशात् । परिणमति परिणमन्ति हि देशाः सर्वे सदेकतरित्तति चेत् ||४६६|| अर्थ - इस पर फिर शंकाकार अन्वय वाक्य द्वारा अपनी शंका को सिद्ध करता है कि कारणवश सत् के किसी एक देश के परिणमन ( हलन-चलन) पर उसके सब देश हिलते हैं क्योंकि उन सब देशों की एक ही सत्ता है। न यत सव्यभिचार: पक्षोऽजैकान्तिकत्वदोषत्वात् । परिणमति समयदेशे तद्देशाः परिणन्ति नेति यथा || ४६७ ॥ अर्थ - ऊपर जो अन्वय बतलाया गया है वह ठीक नहीं है क्योंकि वैसा अन्वय पक्ष अनैकान्तिक देश आने से सव्यभिचारी(दोषी) है। वह दोष इस प्रकार आता है कि आत्मा के एक देश के हिलने पर भी उसके सब देश नहीं हिलते हैं। नोट- शंकाकार ने ऊपर अन्वय वाक्य कहा था। उसमें ग्रन्धकार ने दोष दिखलाया। अब अगले श्लोक द्वारा वह व्यतिरेक वाक्य कहकर अपने पक्ष को पुनः सिद्ध करना चाहता है - व्यतिरेके वाक्यमिदं यदपरिणमति सदेकटेशे हि । क्वचिदपि न परिणमन्ति हि तद्देशाः सर्वलः सदेकत्वात् ॥ ४६८॥ अर्थ - व्यतिरेक में यह युक्ति है कि सत् के किसी एक देश में परिणमन* *(गुण परिणमन) नहीं होने पर उसके सब प्रदेश कहीं पर भी (गुण) परिणमन नहीं करते हैं। क्योंकि उन सब देशों का एक ही सत्व है। * यह ध्यान रहे यहाँ गुण परिणमन से आशय नहीं है किन्तु प्रदेशों के संकोच विस्तार से आशय है। ** यह ध्यान रहे कि यहाँ गुण परिणमन से आशय है, प्रदेश परिस्पन्द से नहीं है।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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