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________________ ११६ ग्रन्थराज श्री पञ्चाध्यायी यह तो बता कि उनका क्षेत्र से अनेकत्व सिद्ध कैसे करोगे ? सीधी बात है कि अगर कभी-कभी वह अपने प्रदेशों में हीनाधिक भोग करने लगें अर्थात् उनके उपभोग प्रदेश कभी कम हो जाये कभी ज्यादा हो जायें तभी क्षेत्र से अनेकत्व बने और कोई उपाय अनेकत्व बनने का है नहीं। किन्तु ऐसा कभी होता हैं। इसलिये बात अटक गई तो आचार्य कहते हैं कि एकत्व तो बनता है पर अनेकत्व नहीं बनता। जब अनेकत्व नहीं बनता तो यह एकत्व भी इस तरह मानना ठीक नहीं क्योंकि हम जैन तो दोनों धर्मं मानते हैं। सर्वथा एक नहीं मानते। सदनेकं नववधू चेत् । व्योमादीनां न तद्धि तदयोगात् ॥ ४५८ ।। अर्थ - ऊपर के उत्तर में यदि कहो कि सत् के प्रदेशों का संकोच विस्तार होता है। इसलिये सत् का उपभोग क्षेत्र अनेक हो जायेगा, ऐसी आशंका ठीक नहीं है, यदि सत् के प्रदेशों का संकोच और विस्तार होने से ही उसे अनेक कहा जाय तो आकाश आदि नित्य-विभु (सर्वव्यापक) पदार्थों में अनेकत्व नहीं घट सकेगा, क्योंकि आकाश, धर्मअधर्म के प्रदेशों का संकोच विस्तार ही नहीं होता है। अपि परमाणोरिह वा कालाणोरेकदेशमात्रत्वात् । कथमिव सदनेकं स्यादुपसंहारप्रसर्पणाभावात् ॥ ४५९ ॥ अर्थ तथा परमाणु और कालाणु ये दो द्रव्य एक-एक प्रदेश मात्र हैं। इनमें संकोच विस्तार हो ही नहीं सकता है, फिर इनमें अनेकत्व किस प्रकार सिद्ध होगा ? इस प्रकार जब अनेकत्व सिद्ध नहीं होता तो निश्चित उपभोग क्षेत्र की अपेक्षा सत् एक भी सिद्ध नहीं हो सकता। तीसरा लक्षणाभास तथा दृष्टान्ताभास ४६० से ४६९ तक ननु च सदेकं देशैरिव संख्यां खन्डयितुमशक्यत्वात् । अपि सदनेकं देशैरित संख्यानेकतो नयादिति चेत् ॥ ४६० ॥ अर्थ- क्योंकि भिन्न-भिन्न द्रव्यों के समान प्रदेशों की संख्या का खण्ड-खण्ड नहीं किया जा सकता है इसलिये तो सत् एक है और भेद दृष्टि से भिन्न-भिन्न द्रव्यों के समान प्रदेशों से अनेक संख्यावाला है, इस नय से वह अनेक है, यदि ऐसा कहो तो । देशानामुपसंहारात्प्रसर्पणादिति भावार्थ जैसे जीव असंख्यात् प्रदेशी है, इसलिये तो अनेक है और वे प्रदेश एक-एक तोड़कर भिन्न-भिन्न नहीं किये जा सकते इसलिये एक है अर्थात् सत् के प्रदेश सदा अखण्ड रहते हैं इसलिये तो वह एक है परन्तु अखण्ड रहने पर भी उसके प्रदेशों की संख्या अनेक है, इसलिये वह अनेक भी कहा जाता है। यदि ऐसा कहो तो गलत है। बहुत विद्वान् इसी प्रकार मानते हैं, सो ध्यान रहे यह लक्षणाभास है। कैसे सो दोष दिखलाते हैं न यतोऽशक्यविवेचनमेक क्षेत्रावगाहिलां चास्ति । एकत्वमजेकत्वं न हि तेषां तथापि तदयोगात् ॥ ४६१ ।। अर्थ- नहीं। क्योंकि यद्यपि एक क्षेत्रावगाही अनेक द्रव्यों का भेद करना शक्य नहीं है तथापि ऐसा न कर सकने के कारण उनका एकत्व और अनेकत्व नहीं है। ते यथा प्रदेशाः सन्ति मिथो गुम्फितैकसूत्रत्वात् । तथा सदनेकत्वादेक क्षेत्रावगाहिनः सन्ति || ४६२ ॥ अर्थ - इस पर फिर शंकाकार कहता है जिस प्रकार एक द्रव्य के प्रदेश एक सूत्र में गुम्फित ( गूंथे हुये ) होते हैं, उस प्रकार एक क्षेत्रावगाही अनेक द्रव्यों के नहीं होते क्योंकि उनकी सत्ता जुदी जुदी है। जनु 되 भावार्थ - शंकाकार फिर भी अपनी शंका को पुष्ट करता है कि जिस प्रकार एक द्रव्य के प्रदेश अखण्ड होते हैं उस प्रकार अनेक द्रव्यों के एक क्षेत्र में रहने पर भी अखण्ड प्रदेश नहीं होते हैं क्योंकि वे अनेक द्रव्य हैं। उनकी सत्ता जुदी - जुदी है। यहाँ तो द्रव्य ही एक है।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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