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________________ ग्रन्थराज श्री पञ्चाध्यायी क्या वे दो मित्रों के समान हैं अथ किमुपादानया स्वार्थ सृजति कश्चिदन्यतमः । अपरः सहकारितया प्रकृतं पुष्णाति मित्रवत्तदिति ।। ३५६ ॥ अर्थ - अथवा कोई एक उपादान कारण होकर अपने कार्य को करता है और दूसरा सहकारी कारण बनकर प्रकृत कार्य को पुष्ट करता है। जिस प्रकार ये दो मित्र है उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम है ॥ ३५६ ।। क्या वे आदेश के समान हैं शत्रुवदाटेश: स्यात्तद्वत्तद् द्वैतमेव किमिति यथा । एकं विनाश्य मूलाटन्यतमः स्वयमुदेति निरपेक्षः ॥ ३७॥ अर्थ - अथवा आदेश शत्रु के समान होता है उसी प्रकार ये दोनों हैं क्या। जिससे कि इनमें से कोई एक-दूसरे का समूल नाश करके निरपेक्ष भाव से स्वयं उदित होता है। ३५७।। क्या वे दो रज्जुओं के समान हैं अथ किं वैमुख्यतया विसन्धिरूपं द्वयं तदर्धकृते । वामेतरकरवर्तितरज्जूयुग्मं यथास्वमिदमिति चेत् ।। ३५८ ॥ अर्थ - अथवा जिस प्रकार वाम और पक्षिण हार में हो बासी मोतियाँ पराया मुखता से अलग-अलग रहकर भी यथायोग्य कार्य करती हैं, उसी प्रकार क्या सत् और परिणाम भी परस्पर विमुखता से अनमिल रहकर ही अपने कार्य को करते हैं ॥ ३५८॥ विशेषार्थ - पहले यह बतलाया जा चुका है कि वस्तु सत् और परिणाम उभयरूप है। तथापि इनमें से जब जो विवाक्षत हाता है तब वह उसरूप प्रतीत होती है, क्योंकि सत् और परिणाम ये सर्वथा जदे नहीं हैं। किन्त इस विवेचन से सन्तुष्ट न होकर शंकाकार ने सत् और परिणाम के विषय में दृष्टान्त पूर्वक अनेक आपत्तियाँ उपस्थित की हैं। आगे स्वयं ग्रन्थकार इन आपत्तियों का निराकरण करनेवाले हैं, अतः यहाँ जिन उदाहरणों का आश्रय लेकर ये आपत्तियों खड़ी की गई हैं उनके विषय में अधिक नहीं लिखा जाता है ॥३४१-३५८॥ समाधान जैवमदृष्टान्तत्वात् स्वेतरपक्षोभयस्य घातित्वात् । नाचरते मन्दोऽपि च स्वस्य विनाशाय कश्चिदेव यतः ॥ ३५९ ।। अर्थ - यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि अपने पक्ष की पुष्टि में जो दृष्टान्त दिये गये हैं वे जब स्व और पर दोनों पक्षों के घातक होने से दृष्टान्त ही नहीं ठहरते तब ऐसा कौन मन्दबुद्धि पुरुष होगा जो स्वयं अपने विनाश के लिये प्रयत्न करेगा। अर्थात् कोई भी नहीं हो सकता है ।। ३५९॥ सत् और परिणाम के विषय में वर्णपंक्ति का दृष्टान्त ठीक नहीं है तत्र मिथरसापेक्षधर्मद्वयटेशिनः प्रमाणस्य । मा भूदभाव इति न हि दृष्टान्तो वर्णपंक्तिरित्यत्र ॥ ३६० ।। अपि च प्रमाणाभावे न हि नयपक्ष: क्षमः स्वरक्षायै। वाक्यविवक्षाभावे पटपक्ष: कारकोऽपि नार्थकृते ॥ ३१॥ संस्कारस्य वशादिह पदेष वाक्यप्रतीतिरिति चेदै । वाच्यं प्रमाणमानं ज नया युवतस्य दुनितारत्वात् ।। ३६२ ॥ अथ चैव सति नियमाद् दुर्वारं दूषणद्वयं भवति । जयपक्षच्युतिरिति वा क्रमवर्तित्वाद् ध्वजेरहेतुत्वम् ।। ३६३ ।। अर्थ - परस्पर में सापेक्ष सत् और परिणाम इन दोनों धर्मों को विषय करने वाले प्रमाण का अभाव करना इष्ट नहीं, इसलिए प्रकृत में जो वर्णपंक्ति का दृष्टान्त दिया है वह ठीक नहीं है ॥३६॥ यदा कदाचित् प्रमाण का अभाव
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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