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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५९ और अबन्धप्रकृति ३१ । असंयतगुणस्थान में व्युच्छित्ति गुणस्थानोक्त १०, बन्ध मनुष्यायु-तीर्थकर सहित ७२ एवं अबन्ध २९ प्रकृति का है। प्रथम द्वितीय-तृतीयनरकमें बन्ध-अबन्ध और बन्धव्युच्छित्तिरूप
प्रकृतियों की संदृष्टि(पर्याप्तावस्था में बन्ध योग्य १०१ प्रकृति । गुणस्थान चार ।)
गुणस्थान ||
बन्ध
अबन्ध
मिथ्यात्व | १००
सालादन मिश्र
व्युच्छित्ति
विशेष १ (तीर्धकर) ४ (मिथ्यात्व, हुण्डकसंस्थान,
___ नपुंसकवेद, सृपाटिकासंहनन) २५ । २५ (गुणस्थानोक्त) ० । ३१ (२५+५+१(मनुष्यायु) या इस गुणस्थान में
आय का बन्ध नहीं होता।) २९ [३१-२ (तीर्थक्कर-मनुष्यायु) इन दो प्रकृतियों
का बन्ध इस गुणस्थान में होता है। १० (गुणस्थानोक्त)]
."
असंयत
द्वितीय-तृतीयनरक में जातेसमय सम्यक्त्व छूट जाता है तथा एकअन्तर्मुहर्त तक तीर्थङ्करप्रकृति का बन्ध रुक जाता है। अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् वेदकसम्यक्त्वको प्राप्तकर तीर्थकरप्रकृति का बन्ध पुनः होने लगता है।
अञ्जनादि तीन नरकों में तीर्थङ्करप्रकृतिबिना बन्धयोग्य १०० प्रकृति हैं। शेष सर्वकथन धर्मादि के समान ही जानना। यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूप प्रकृति ४, बन्धप्रकृति १०० तथा अबन्धशून्य। सासादन में व्युच्छिन्नप्रकृति २५, बन्धप्रकृति ९६ एवं अबन्धप्रकृति चार। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छित्ति शून्य, बन्ध मनुष्यायु के बिना ७०, अबन्धप्रकृति ३० । असंयतगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूप प्रकृति १०, बन्ध मनुष्यायु सहित ७१ का और अबन्ध २९ प्रकृतिका ।