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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६० अञ्जनादि चतुर्थ-पंचम षष्ठ नरक में बन्ध-अबन्ध-बन्धव्युच्छित्तिरूप कर्म-प्रकृतियों की संदृष्टि - यहाँ पर्याप्तावस्था में बन्धयोग्य प्रकृति १०० । गुणस्थान चार । गुणस्थान बन्ध अबन्ध बन्ध व्युच्छित्ति विशेष मिथ्यात्व १०० सासादन ४ (पूर्वोक्त मिथ्यात्वादि) २५ (पूर्वोक्त ३० [२५+४+१(मनुष्यायु)] २९ [३०-१ (मनुष्यायु)} मिश्र असंयत माघवीनामक सप्तमनरक में मनुष्यायुबिना बन्धयोग्य ९९ प्रकृतियाँ हैं और गुणस्थान चार है।। मिथ्यात्वगुणस्थान में मिथ्यात्वादि पूर्वोक्त चार प्रकृतियाँ और तिर्यञ्चायु इन पाँच की व्युच्छित्ति, उच्चगोत्र-मनुष्यद्विकबिना ९६ का बन्ध तथा उच्चगोत्रादि तीन का अबन्ध । सासादन में तिर्यञ्चायु बिना २४ की व्युच्छित्ति, बन्ध ९१ प्रकृतिका और अबन्धरूप ८ प्रकृतियाँ। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छित्ति शून्य, उच्चगोत्र और मनुष्यद्विकसहित बन्ध ७० प्रकति का, अबन्धरूप २९ प्रकृति । असंयतगुणस्थान में व्युच्छित्ति मनुष्यायुबिना ९, बन्धरूप ७० प्रकृति, अबन्धरूप २९ प्रकृति। सप्तम माधवीनामक पृथ्वीसम्बन्धी बन्ध-अबन्ध-बन्धव्युच्छित्तिरूप प्रकृतियों की संदृष्टि पर्याप्तावस्था में बन्धयोग्यप्रकृति ९९ । गुणस्थान चार। बन्ध गुणस्थान अबन्ध व्युच्छित्ति विशेष मिथ्यात्व सासादन मिश्न असंयत ३ (उच्चगोत्र-मनुष्यद्विक) ५ (पूर्वोक्तमिथ्यात्वादि ४+१ तिर्यञ्चायु) २४ (गुणस्थानोक्त २५-१ तिर्यंचायु) २९ [२४+८-३(उच्चगोत्र-मनुष्यद्विक)] ९ [गुणस्थानोक्त १०-१ (मनुष्यायु)]
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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