SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 96
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५८ मार्गणाओं के अन्तर्गत गतिमार्गणा में सर्वप्रथम नरकगति सम्बन्धी अबन्ध, बन्ध में बन्धव्युच्छित्तिरूप प्रकृतियों को तीन गाथाओं से कहते हैं - . . .. ... .. ... ओझे वा आदेसे णारयमिच्छम्हि चारि वोच्छिण्णा। उवरिम वारस सुरचउ सुराउ आहारयमबन्धा ॥१०५॥ घम्मे तित्थं बंधदि वंसामेघाण पुण्णगो चेव। छट्ठोत्ति य मणुवाऊ चरिमे मिच्छेव तिरियाऊ॥१०६॥ मिस्साविरदे उच्च मणुवदुगं सत्तमे हवे बन्धो। मिच्छा सासणसम्मा मणुवदुगुच्चं ण बंधंति ॥१०७॥ अर्थ - मार्गणाओं में व्युच्छित्ति आदि गुणस्थान के समान ही हैं, किन्तु विशेषता यह है कि नरकगतिसम्बन्धी मिथ्यात्वगुणस्थान में चार प्रकृतियों की ही व्युच्छित्ति होती है। शेष एकेन्द्रियादि १२, सुरचतुष्क, देवायु, आहारकशरीर-आहारकअनोपान इन १९ प्रकृतियों का बन्ध नहीं होता है ॥१०५॥ घर्मानामक प्रथमपृथ्वी में जीव पर्याप्त-अपर्याप्त अवस्था में तीर्थङ्कर-प्रकृति का बन्ध करता है। वंशा-मेघानामक द्वितीय-तृतीयनरक में पर्याप्त जीव ही तीर्थक्करप्रकृतिका बन्ध करता है, अपर्याप्त नहीं। माघवीनामक षष्ठपृथ्वीपर्यंत ही मनुष्यायु का बन्ध होता है, अन्तिम माघवीपृथ्वीकी मिथ्यात्वअवस्था में ही तिर्यञ्चायु का बन्ध होता है।।१०६॥ सप्तमनरक के मिश्र और असंयतगुणस्थान में ही उच्चगोत्र और मनुष्यद्विक का बन्ध है, किन्तु मिथ्यात्व और सासादनगुणस्थानवर्ती इनका बन्ध नहीं करते हैं। पर्याप्तमिथ्यादृष्टि के इन तीनों का अबन्ध है।।१०७॥ विशेषार्थ - मार्गणाओं में गुणस्थानवत् बन्ध-अबन्ध और बन्धव्युच्छित्ति का कथन जानना, ! किन्तु विशेषता यह है कि नरकगतिसम्बन्धी मिथ्यात्वगुणस्थान में मिथ्यात्व-हुण्डकसंस्थान-नपुंसकवेद और सृपाटिकासंहनन, इन चार की व्युच्छित्ति होती है। शेष एकेन्द्रियादि १२, देवगति-देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिक अङ्गोपाङ्ग, देवायु और आहारकद्विक का बन्ध नहीं है। धर्मादि तीन नरकपृध्वियों की पर्याप्तावस्था में बन्धयोग्य १०१ प्रकृति हैं। गुणस्थान आदि के चार । मिथ्यात्वगुणस्थान में मिथ्यात्व-हुण्डकसंस्थान-नपुंसकवेद और सृपाटिकासंहनन की बन्धव्युच्छित्ति, बन्धप्रकृति १०० तथा अबन्ध एक तीर्थङ्करप्रकृति का। सासादनगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति २५, बन्धप्रकृति ९६ और अबन्धप्रकृति ५। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छित्ति शून्य, बन्ध मनुष्य आयु बिना ७०
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy