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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड ५७ द विशेषार्थ - मिथ्यात्वगुणस्थान में तीर्थङ्करप्रकृति एवं आहारकद्विक इन तीन प्रकृति का अबन्ध है। ये तीन तथा १६ व्युच्छित्तिरूप प्रकृतियाँ मिलाने से सासादन गुणस्थान में अबन्धरूप १९ प्रकृतियाँ हैं। इन १९ में व्युच्छिन्नरूप २५ प्रकृति तथा देवायु-मनुष्यायु के मिलाने पर मिश्रगुणस्थान में ४६ का अबन्ध है। इनमें से तीर्थङ्कर, देवायु और मनुष्यायु को कम करने पर असंयत में ४३ प्रकृतिका अबन्ध है। इनमें चतुर्थगुणस्थान की बन्ध से व्युच्छिन्न होनेवाली १० प्रकृतियाँ मिलाने से देशसंयत गुणस्थान में अबन्धरूप ५३ प्रकृतियाँ हैं, इनमें व्युच्छित्ति को प्राप्त चार प्रकृति मिलाने पर प्रमत्तसंयत में ५७ प्रकृति की अबन्ध है । इन ५७ प्रकृतियों में छठे गुणस्थान में व्युच्छिन्न होने वाली ६ प्रकृतियों को मिलाने पर तथा आहारकद्विक को घटाने पर अप्रमत्त में ६९ का अबन्ध है। इनमें एक देवायु को मिलाने से ६२ प्रकृतियाँ अपूर्वकरणगुणस्थान में अबन्धरूप हैं। इसी गुणस्थान में व्युच्छित्ति को प्राप्त ३६ प्रकृतियों को ६२ में मिलाने से अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में ९८ का अबन्ध है। यहाँ व्युच्छिन्न होनेवाली ५ प्रकृति तथा पूर्वोक्त ९८ प्रकृतियाँ मिलकर १०३ प्रकृति सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में अबन्धरूप हैं । बन्ध से व्युच्छित्र १६ प्रकृतियों को १०३ में मिलाने पर उपरितन उपशान्तमोह-क्षीणमोह और सयोगकेवलीगुणस्थानों में ११९-११९ प्रकृतियों का अबन्ध पाया जाता है। इनमें एक सातावेदनीय प्रकृति मिलाने से अयोगकेवली गुणस्थान में अबन्धरूप १२० प्रकृतियाँ जानना | गुणस्थानों में अबन्ध-बन्ध और बन्ध से व्युच्छिन्नप्रकृतियों की सन्दृष्टि गुणस्थान मिथ्यात्व सासादन मिश्र सूक्ष्मसाम्पराय उपशान्तमोह अबन्ध बन्ध रूप बन्ध से रूप व्युच्छिन्न प्रकृतियाँ प्रकृतियाँ प्रकृतियाँ असंयत देशसंयत प्रमत्तविरत ५७ अप्रमत्तविरत ६१ ६२ अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण ९८ १०३ ११९ ११९ ११९ १२० क्षीणमोह सयोगी अयोगी ३ १९ ४६ ४३ ५३ ११७ १०१ ७४ يي ६७ ६३ ५९ ५८ २२ १७ १ ? १ c १६ २५ 0 १० ४ ६ १ ३६ ५ १६ ० १ ० विशेष ३ (आहारकद्विक, तीर्थङ्कर) |४६ (१९+२५ = ४४ + २ ( मनुष्यायु, देवायु)) ४३ (४६ ३ तीर्थकर, देवायु, मनुष्यायु) ६१ (६३ - २ ( आहारकद्विक ) )
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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