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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ५६ नोट: समनामी की अपेक्षा से है। अब बन्ध-अबन्धरूप प्रकृतियों को दो गाथाओं से कहते हैं - सत्तरसेकग्गस्यं चउसत्तत्तरि सगट्ठि तेवट्ठी । बंधा ragaण्णादुवीस सत्तारसेकोधे ।। १०३ ॥ अर्थ - मिथ्यात्वादि गुणस्थानों में क्रम से ११७-१०१-७४-७७-६७-६३-५९-५८-२२१७- १-१ और १ प्रकृति के बन्ध का यह क्रम सयोगीगुणस्थानपर्यंत कहा है। = १९ विशेषार्थ - अभेदविवक्षा से १२० प्रकृतियाँ बन्धयोग्य कही गई हैं। उनमें से मिध्यात्वगुणस्थान में ११७ प्रकृति का बन्ध है, क्योंकि यहाँ तीर्थङ्कर एवं आहारकद्विक, इन तीनप्रकृतियोंका बन्ध नहीं होता । अतः तीन तो ये तथा मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छिन्न होनेवाली १६ इस प्रकार १६ + ३ प्रकृतियों का बन्ध न होने से सासादनगुणस्थान में बन्धयोग्य १०१ प्रकृति हैं । इस गुणस्थान में बन्ध से व्युच्छिन्न प्रकृतियाँ तथा देवायु-मनुष्यायुका बन्ध मिश्रगुणस्थान में नहीं होता अतः दो, इस प्रकार २५+२ = २७ प्रकृतियों का बन्ध न होने से मिश्रगुणस्थान में ७४ प्रकृति का ही बन्ध है। असंयतगुणस्थान में पूर्वोक्त ७४ में तीर्थङ्कर - देवायु और मनुष्यायु मिलाने से ७७ प्रकृति का बन्ध है। चतुर्थगुणस्थान में व्युच्छिन्न होने वाली १० प्रकृतियों को कम करने से देशसंयतगुणस्थान में ६७ प्रकृतियाँ बन्धयोग्य हैं । पञ्चमगुणस्थान में चार प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है उनको ६७ में से घटाने पर प्रमत्तसंयत में ६ ३ का बन्ध है । यहाँ पर व्युच्छिन्नरूप ६ प्रकृतियों को कम करके आहारकद्विक मिलाने पर अप्रमत्त- गुणस्थान में ५९ का बन्ध है । यहाँ एक देवायु की व्युच्छित्ति है अतः इसको घटाने अपूर्वकरण में ५८ का बन्ध है । इस गुणस्थान के सात भागों में से प्रथम-षष्ठ और सप्तम भाग में ३६ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है, इनको घटाने से अनिवृत्तिकरण में २२ प्रकृति का बन्ध है । इस गुणस्थान के पाँचभागों में पाँचप्रकृति की व्युच्छित्ति है इसलिए उनको कम करने पर सूक्ष्मसाम्पराय में १७ प्रकृति का बन्ध है । यहाँ पर व्युच्छित्ति १६ प्रकृति की है, उनको घटाने पर एक सातावेदनीयप्रकृति रही इसका बन्ध उपशान्तमोह, क्षीणमोह और सयोगकेवलीगुणस्थान में समझना चाहिए। तिय उणवीसं छत्तियतालं तेवण्ण सत्तवण्णं च । sages विरहि सय तियउणवीससहिय वीससयं ॥ १०४ ॥ अर्थ - मिथ्यात्व आदि गुणस्थानों में क्रम से ३-१९-४६-४३-५३-५७-६१-६२-९८१०३-११९-११९-११९ और १२० ये क्रम से अबन्धरूप प्रकृतियाँ हैं।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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