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गोम्मटसार कर्मकाण्ड -
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है, वहाँ पर तो उन उन कर्मों का बंध, उदय अथवा सत्त्व रहता है, उससे आगे नहीं रहता। ऐसा व्युच्छित्ति का स्वरूप जानना सो यह तो द्रव्यार्थिकनय का अभिप्राय है तथा उसी पुरुष को पूछने पर ऐसा भी कहा गया कि हम अमुकनगर को छोड़कर अमुकनगर आये और वहाँ से पृथक हुए तो जैसे जहाँ संयोग का अभाव हुआ बिछुड़ना वहीं हुआ में का अभाव जानना, यह
पर्यायार्थिकनय का अभिप्राय है ।
अब प्रथमगुणस्थानसम्बन्धी व्युच्छित्तिरूप प्रकृतियों के नाम कहते हैं।
मिच्छत्तहुंडढाऽसंपत्तेयक्खथावरादावं ।
सुमतियं वियलिंदिय णिरयदुणिरयाउगं मिच्छे ॥ ९५ ॥
अर्थ - मिथ्यात्व, हुण्डकसंस्थान, नपुंसकवेद, असम्प्राप्तासृपाटिकासंहनन, एकेन्द्रियजाति, स्थावर, आतप, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, विकलत्रय ( द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय- चतुरिन्द्रिय) नरकगति, नरकगत्त्यानुपूर्वी और नरकायु इन १६ प्रकृतियों की बन्ध व्युच्छित्ति मिथ्यात्वगुणस्थान के अन्त में होती
है।
द्वितीयगुणस्थान में बन्ध से व्युच्छिन्न प्रकृतियों को कहते हैं
विदियगुणे अणथीणतिदुभगतिसंठाणसंहदिचउक्कं । दुग्गमणित्थीणीचं तिरियदुगुज्जोवतिरियाऊ ॥ ९६ ॥
अर्थ - द्वितीयगुणस्थान के अन्त में अनन्तानुबन्धी चतुष्क, स्त्यानगृद्धि, निद्रा-निद्रा, प्रचलाप्रचला, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, न्यग्रोधपरिमण्डल, स्वाति, कुब्जक और वामनसंस्थान, वज्रनाराचनाराच अर्धनाराच और कीलितसंहनन, अप्रशस्त - विहायोगति, स्त्रीवेद, नीचगोत्र, तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चायु और उद्योत ये २५ प्रकृतियाँ व्युच्छिन्न होती हैं।
विशेषार्थ - ये २५ प्रकृतियाँ अनन्तानुबन्धी के उदयबिना मिथ्यादृष्टि के भी बँधती हैं तथा मिथ्यात्व के उदय से रहित सासादन में केवल अनन्तानुबन्धी से भी बँधती हैं। इस प्रकार इनका कारण मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी दोनों ही जानने ।
आगे चतुर्थ - पंचमगुणस्थानमें बंधव्युच्छित्तिरूप प्रकृतियों के नाम कहते हैं अयदे बिदियकसाया वज्जं ओरालमणुदुमणुवाऊ । देसे तदियकसाया णियमेणिह बंधवोच्छिण्णा ॥ ९७ ॥