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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ५३
अर्थ - चतुर्थगुणस्थान में द्वितीय अप्रत्याख्यानावरण की चारकषाय, वज्रर्षभ नाराचसंहनन, औदारिकशरीर, औदारिक अङ्गोपाङ्ग, मनुष्यगति-मनुष्यगत्यानुपूर्वी - मनुष्यायु इन १० प्रकृतियों की बन्धव्युच्छित्ति होती है। तथा देशसंयतगुणस्थान में प्रत्याख्यानावरण की चारकषाय बन्ध से व्युच्छिन्न होती हैं।
अथानन्तर प्रमत्त- अप्रमत्तगुणस्थानमें बन्धव्युच्छित्तिरूप प्रकृतियों के नाम कहते हैं -
छट्टे अथिरं असुहं असादमजसं च अरदिसोगं च । अपमत्ते देवाऊणिवणं चेव अस्थित्ति ॥ ९८ ॥
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अर्थ - छठे गुणस्थान में अस्थिर, अशुभ, असातावेदनीय, अयशस्कीर्ति, अरति और शोक इन छह प्रकृतियों की बन्धव्युच्छित्ति होती है। तथा अप्रमत्तगुणस्थान में एक देवायु के बन्धनिष्ठापन की व्युच्छित्ति होती है।
अपूर्वकरण गुणस्थान में बन्धव्युच्छित्तिरूप प्रकृतियों को कहते हैं।
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मरणूणम्हि णिट्टीपढमे णिद्दा तहेव पयला य । छडे भागे तित्थं णिमिणं सग्गमणपंचिंदी ॥ ९९ ॥
तेज दुहारदुसमचउसुरवण्णागुरुचउक्कतसणवयं । चरमे हस्सं च रदी भयं जुगुच्छा य बंधवोच्छिष्णा ॥ १०० ॥
अर्थ - निवृत्ति अर्थात् अपूर्वकरणगुणस्थान के मरणरहित प्रथमभाग में श्रेणी चढ़ते समय निद्रा और प्रचला इन दो प्रकृतियों की, छठे भाग में तीर्थकर, निर्माण, प्रशस्त विहायोगति, पञ्चेन्द्रियजाति, तैजस-कार्मण- आहारकशरीर आहारक अङ्गोपाङ्ग, समचतुरस्त्रसंस्थान, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकअङ्गोपाङ्ग, स्पर्श-रस- गन्ध-वर्ण, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, स, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय इन तीसप्रकृतियों की तथा समभाग में हास्य, रति, भय, जुगुप्सा इन चार की बंधव्युच्छित्ति होती है।
विशेषार्थ - आठवें गुणस्थान के सातभागों में से प्रथम षष्ठ और सप्तम इन तीनों भागों में ही उपर्युक्त ३६ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है, शेषभागों में व्युच्छित्ति नहीं है। एक ही समय में स्थित नाना जीवों के भिन्न-भिन्न परिणाम सम्भव हैं अतः इसको निवृत्तिगुणस्थान कहा है।
अब अनिवृत्तिकरण - सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें बन्धसे व्युच्छिन्नप्रकृतियाँ कहते हैं -