________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-८३२ पारिभाषिक शब्द सर्वपदभङ्ग सर्वसंक्रमभागहार सादिबन्ध सांतरबन्धप्रकृति सिद्धान्तचक्रवर्ती जहाँ पृथक् पृथक् सम्पूर्णभावोंका ग्रहण किया जावे वे सर्वपद भंग हैं। (गाथा 844) सर्वप्रदेशीका जो युगपत् संक्रम होता है वह सर्वसंक्रम है। इसका भागहार एक अक्त है। (गाथा 409 टीका) जो बंध छूटकर पुन:बंधे वह सादिबंध है। (गाथा 90, 123 टीका) एकसमयमें बँधकर द्वितीय समयमें बन्धविश्रान्ति देखी जाती है वह सान्तरप्रकृति है। (ध.पु. 8 पृ. 100) (गाथा 399 टीका) जिसप्रकृतिका बन्ध जघन्यसे एक समय और उत्कृष्टसमयको आदिकरके अन्तर्मुहर्तसे पूर्वतकबंधने वाली प्रकृति सान्तरबंधी है अथवा अन्तर्मुहूर्तके मध्यमें बन्धविच्छेद होकर पुनः अन्तरसहित बंधने वाली प्रकृति सान्तरबन्ध प्रकृति है। (क.प्र. पृ. 14-15) बुद्धिरूपी चक्रसे जीवस्थान, क्षुद्रबन्ध, बन्धस्वामित्व, वेदनाखण्ड, वर्गणाखण्ड व महाबन्धके भेदसे षट्खण्डागमरूप शास्त्रमें भले प्रकार अवगाहन करनेवाला। (गाथा 397) तिर्यंचगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चायु व उद्यात ये चारप्रकृतियाँ सत्तारचतुष्क या शतारचतुष्क कहलाती हैं। जो प्रकृति अन्य प्रकृतिरूप उदय होकर नाशको प्राप्त होती है. उन परमुखांदयो प्रकृतियों के तो अन्तकाण्डकको अन्तिमफालि क्षयदेश है तथा जो स्वमुख उदधम्पस उदय होकर निकलती हैं उनका एकआवलि प्रमाणकाल शेष रहनेपर क्षयदेश है। (गाधा 512, 445 टीका) प्रतिपक्षकर्मके सर्वथा क्षयसे क्षायिकभाव होता है। (गाथा 854) प्रतिपक्षीकोंके देशघाति स्पर्धको का उदय होने पर भी जीवका गुण प्रगट हो वह मिश्र (क्षायोपशामक) भाव है। (गाथा 814) शतारचतुष्क (सतारचतुष्क) क्षयदेश क्षायिक क्षायोपशमिकभाष 卐卐