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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४९ विशेषार्थ - उपशमश्रेणीपर चढ़नेवाला जीव दशवेंगुणस्थान में गया। वहाँ उच्चगोत्र का उत्कृष्टअनुभागबन्ध हुआ। पश्चात् उपशान्तकषायगुणस्थान में गया। बाद में वही जीव वापस दशवेंगुणस्थान में आया तब उसने उच्चगोत्रका अनुत्कृष्टबन्ध किया। वहाँ इस अनुत्कृष्टबन्ध को सादि बन्ध कहते हैं, क्योंकि पहले इस बन्ध का अभाव हुआ था, परन्तु पुनः होने लगा। सूक्ष्मसापरायगुणस्थान से अधस्तनगुणस्थानवी जीवों के इस प्रकृति का बन्ध अनादि है, अभव्य जीवों के ध्रुवबन्ध है तथा उपशमश्रेणीवालों के अनुत्कृष्टबन्ध का अभाव होकर जब उत्कृष्टबन्ध होता है वह अध्रुवबन्ध है। अजघन्य में भी ये चार प्रकार के बन्ध निम्न प्रकार हैं - सप्तमनरक में गया नारकीजीव मिथ्यात्व के चरमसमय से पूर्व नीचगोत्र का जो बन्ध करता है वह अनादिबन्ध है। तथा वही जीव जब प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख हुआ तब उसने मिथ्यात्व के चरमसमय में नीचगोत्र अयअनुगमध किया था सम्यग्दृति होकर पुन: मिथ्यात्व के उदय से मिध्यादृष्टि हुआ तब नीचगोत्र का अजघन्य अनुभाग बन्ध किया। इस प्रकार उस जगह नीचगोत्र का सादिबन्ध है फिर उसी मिथ्यादृष्टि जीव के द्वितीयादिक समयों में नीचगोत्र का जो बन्ध है, वह अनादि है। तथा अभव्यजीव के नीचगोत्र का अजघन्यअनुभागबन्ध ही ध्रुवबन्ध है। अजघन्य को छोड़कर जघन्य को प्राप्त हुआ वहाँ वह बन्ध अध्रुव है। इस प्रकार अजघन्य नीचगोत्र के अनुभागबन्ध में सादि-अनादि-ध्रुव और अध्रुवरूप चारभेद हैं, अन्यत्र भी जहाँ जैसे संभव हो वहाँ वैसा अन्य बन्धों में भी सादि-अनादि-ध्रुव और अध्रुवरूप चार प्रकार जानना । प्रकृतिबन्ध में उत्कृष्टादि चारभेद नहीं हैं, शेष स्थिति अनुभाग और प्रदेशबन्ध में उत्कृष्टादि भेद हैं। अथानन्तर गुणस्थानों में प्रकृतिबन्ध का नियम कहते हैं - सम्मेव तित्थबन्धो आहारदुर्ग पमादरहिदेसु। मिस्सूणे आउस्स य मिच्छादिसु सेसबंधोदु ॥१२॥ अर्थ - तीर्थंकरप्रकृतिका बन्ध सम्यक्त्वअवस्था में ही होता है। आहारकद्विक का बन्ध अप्रमत्त गुणस्थान में होता है। मिश्रगुणस्थानबिना मिथ्यात्वगुणस्थानसे अप्रमत्तगुणस्थानपर्यंत आयु का बन्ध होता है। विशेषार्थ - तीर्थकरप्रकृति का बन्ध चतुर्थगुणस्थान से अपूर्वकरण के छठे भागपर्यन्त सम्यग्दृष्टि के ही होता है। आहारकशरीर-आहारकअङ्गोपाङ्गका बन्ध अप्रमत्त गुणस्थान से लेकर अपूर्वकरण के छठेभाग तक होता है। तथा आयुकर्म का बन्ध मिश्रगुणस्थान और निर्वृत्तिअपर्याप्तअवस्था को प्राप्त मिश्रकाययोग के बिना मिथ्यात्वगुणस्थान से अप्रमत्तगुणस्थान पर्यन्त होता है। अवशेष प्रकृतियों का बन्ध मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानों में अपनी-अपनी बन्धव्युच्छित्ति पर्यन्त जानना |
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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