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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४८ कर्म की बन्ध-उदय और सत्त्वरूप तीन अवस्थाओं में सर्वप्रथम बन्धअवस्था वर्णन करते हुए बन्ध के भेद कहते हैं -
पयडिडिदिअणुभागप्पदेसबंधोत्ति चदुविहो बंधो।
उक्कस्समणुक्कस्सं जहणमजहण्णगंति पुधं ॥८९।। अर्थ - प्रकृति-स्थिति-अनुभाग और प्रदेश के भेद से बन्ध चार प्रकार का है। इनमें भी प्रत्ये। के उत्कृष्ट-अनुत्कृष्ट-जघन्य और अजघन्यरूप चार भेद हैं।
विशेषार्थ - पौद्गलिक मूल व उत्तरकर्मप्रकृतियों का जीव के साथ संश्लेषसम्बन्ध हो । प्रकृतिबन्ध कहलाता है। जिन कर्मप्रकृतियों का जीव के साथ संश्लेषसम्बन्ध हुआ है उनका जीव साथ जितने कालपर्यन्त सम्बन्ध रहता है, उस काल को स्थितिबन्ध कहते हैं। कर्मों की फलदेने के शक्ति अनुभागबन्ध है। तथा कर्मरूप हुई पौद्गलिककार्मणवर्गणाओं के प्रमाण को प्रदेशबन्ध कहते हैं । सबसे अधिक बन्ध को उत्कृष्टबन्ध कहते हैं। उत्कृष्ट से हीनबन्ध अनुत्कृष्टबन्ध कहलाता है। जघन से अधिकबन्ध को अजधन्यबन्ध एवं सबसे अल्पबन्ध को जघन्यबन्ध कहते हैं। अब उत्कृष्टादि के भेदों को कहते हैं -
सादि अणादी धुव अद्भुवो व बंधो दु जेठमादीसु।
णाणेगं जीवं पडि ओघादेसे जहाजोग्गं ॥१०॥ अर्थ - सादि-अनादि-ध्रुव और अध्रुव के भेद से उत्कृष्टादि भी चार प्रकार के हैं। सादि । अनादि-ध्रुव-अध्रुवबन्ध नानाजीवों की अथवा एकजीव की अपेक्षा ओघ और आदेश में यथासम्भा । जानना चाहिए।
विशेषार्थ - जिसका बन्ध छूटकर पुनः बन्ध हो वह सादिबन्ध है। अनादिकाल से जिसके। संततिरूप बन्धका अभाव नहीं हुआ हो उसे अनादिबन्ध कहते हैं। जिसबन्ध का अभाव नहीं होगा वह ध्रुवबन्ध है। तथा जिसबन्ध का अभाव हो जावेगा वह अध्रुवबन्ध है।
ठिदिअणुभागपदेसा गुणपडिवण्णेसु जेसिमुक्कस्सा।
तेसिमणुक्कस्सो चउव्यिहोऽजहण्णेवि एमेव ।।९१ ॥ अर्थ - मिथ्यात्व आदि गुणस्थानवी जीवों के जिनकर्मों का उत्कृष्ट स्थितिअनुभाग एवं प्रदेशबन्ध होता है उन्हीं कर्मों का अनुत्कृष्ट स्थिति, अनुभाग और प्रदेश बन्ध सादि-अनादि-ध्रुव-अध्रुव के भेद से चार प्रकार का होता है तथा अजघन्य में भी इसी प्रकार ये चारभेद हैं।