________________
गोम्मटसार कर्मकाण्ड-८२७
पारिभाषिक शब्द
लक्षण
औदयिकभाव
औपशमिकभाव
कर्म के उदयसे उत्पन्न हुआ जीवका भाव औदयिकभाव है। (गाथा ८१५) प्रतिपक्षी कर्मके उपशमसे औपशमिकभाव होता है। (गाथा ८१४) विष खानेसे, रक्तक्षयसे, शस्त्रघातसे, संक्लेश, श्वास रुकनेसे, आहार न मिलनेसे जो मरण होता है वह कदलीघातमरण अथवा अकालमरण है। हिम, अग्नि व पानी इत्यादिसे भी अकालमरण होता है। (गाथा
कदलीपातमरण/अकालमरण
कर्मपद
काण्डक
गतिनामकर्म
गुणसंक्रम भागहार
नामकर्मके बन्धस्थानोंकी विवक्षासे होनेवाले जीवों के भेदों को कर्मपद कहते हैं। (गाथा ५१९-२०) अनेक समय समूहमें संक्रमण होनेको काण्डक कहते हैं। (गाथा ४१२) जिसके उदयसे आत्मा पर्यायसे पर्यायान्तरको प्राप्त हो अथवा जिसके उदयसे उस-उस गतिरूप क्रिया व भाव हों वह गति नामकर्म है। (गाथा ३३) प्रत्येकसमयमें असंख्यातगुणित श्रेणीरूपसे प्रदेशसंक्रमण होताहै वह गुणसंक्रम है। इसका भागहार भी पल्यके असंख्यातवेंभाग प्रमाणहै , किन्तु अधः प्रवृत्तसंक्रमभागहारसे असंख्यातगुणा हीन है (जयधवल पु. ९ पृ. १७२) (गाथा ४०९) संतानक्रमसे चले आए जीवके आचरणको गोत्र कहते हैं। जिनका दीक्षायोग्य साधु आचार है तथा साधुआचार वालोंके साथ जिन्होंने सम्बन्ध स्थापित कर लिया है, जो 'आर्य' इसप्रकारके ज्ञान और वचनव्यवहारके निमित्त हैं उन पुरुषों की परम्पराको उच्चगोत्र कहा जाता है उससे विपरीत कर्म नीचगोत्र है (धवल पु. १३ पृ. ३८९) (गाथा १३) जीवके देवत्वगुणको घातनेवाले कर्म घातिया हैं। (जयधवल पु. १ पृ. ६७) (गाथा ९)
गोत्रकर्म
घातिया