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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-८२६
पारिभाषिक शब्द
लक्षण
उत्पादानुच्छेद
उत्पन्नस्थानसत्त्व
उद्योत उद्वेलनसंक्रमण-भागहार
यह द्रव्यार्थिक नय का विषय है। जहाँ अस्तित्व है वहीं विनाश है। जहाँ अस्तित्व ही नहीं वहाँ बुद्धि में आ ही नहीं सकता, क्योंकि अभाव नामका कोई पदार्थं नहीं है। प्रमाण सत्रूप वस्तुको ही जानता है। असत्में प्रमाणका व्यापार ही नहीं है। यदि असत् में प्रमाण का व्यापार माना जावेगा तो गधेके सींगमें प्रमाणके विषयकी प्रवृत्ति मानी जावेगी, किन्तु ऐसा नहीं है। (गाथा ९४) पूर्वपर्यायमें उद्वेलन या उद्वेलनके बिना जो सत्त्व है उसके साथ उत्तर पर्यायमें उत्पन्न होते समय उस उत्तरपर्यायमें जो सत्व है उसे उत्पन्न स्थान सत्त्व कहते हैं। (गाथा ३५१) जिसकी प्रभा (किरणें) भी उष्णतारहित हो। (गाथा ३३) • करणपरिणामोंके बिना रस्सीको उकेलनेके समान कर्मप्रदेशोंका परप्रकृतिरूपसे संक्रान्त होना उद्वेलना संक्रम है, इसका भागहार अंगुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण है (ज.ध.पु. ९ पृ. १७०-१७१) (गाथा ४०९ टीका) जिसप्रकार रस्सीको बल देकर बटा था पुनः बट को खोल दिया उसीप्रकार जिनप्रकृतियोंका बन्ध किया था पश्चात् उसको उद्वेलनभागहारसे अपकर्षण करके अन्य प्रकृतिरूप प्राप्त कराकर नाशकरना उद्वेलना कहलाता है। (गाथा ३४९) उदय, उदीरणा, उत्कर्षण, अपकर्षण, परप्रकृतिसंक्रमणा, स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकांडकघातके बिना ही कर्मों के सत्तामें रहनेको उपशम कहते हैं। (गाथा ३३७) आयुकर्म के बिना शेष सात मूलप्रकृतियोंकी बन्धके समय एककोडाकोडीसागर स्थितिकी आबाधा १०० वर्ष है, किन्तु अन्त:कोडाकोडीकी आबाधा अन्तर्मुहूर्त है। (गाथा ९१५-९१६) आयुकर्मके बिना शेष कर्मों की उदीरणा बन्धावली व्यतीत होनेपर होती है अतः उदीरणा आवाधाकाल एकआवलीप्रमाण है। (गाथा ९१८)
उद्वेलना
उपशम
उदयआबाधा
उदीरणाआबाधा