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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४६ अर्थ - जिसकर्म का जो फल है उसको भोगते हुए जीव को ही उस-उसकर्म का नोआगमभावक जानना चाहिए। पुद्गलविपाकी प्रकृतियों का नोआगमभावकर्म नहीं है। :: विशेषा - पुदालविपाकीप्रकृतियों का उदय होने पर शेष सातावेदनीय आदि प्रकृतियों के सहयोग बिना सुखादिक की उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसी कारण पुद्गलविपाकी प्रकृतियों में नोआगमभावकर्म नहीं कहे। इस प्रकार सामान्यकर्म के भेदों (मूल और उत्तरप्रकृतिरूप) में नामस्थापना-द्रव्य और भाव ये चार निक्षेप कहकर उनके यथार्थस्वरूप का वर्णन किया। श्रीनेमिचन्द्रसिद्धान्तचक्रवर्ती विरचित गोम्मटसारकर्मकाण्ड की "सिद्धान्तज्ञानदीपिका" नामा हिन्दी टीका में 'प्रकृतिसमुत्कीर्तन' नामक प्रथम अधिकार पूर्ण हुआ। ज卐卐
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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