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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४५ अर्थ - शरीरबंधननामकर्म से लेकर जितनी पुद्गलविपाकी प्रकृतियाँ हैं, उनका तथा शेष जीवविपाकी प्रकृतियों का नोकर्मद्रव्य कर्मशरीर ही है, (क्योंकि उनके द्वारा किया गया पुद्गलरूप भाव और जीवभाव तथा सुखादि रूप कार्य का उपादान कारण शरीर सम्बन्धी वर्गणा ही है।) क्षेत्रविपाकीरूप जो चारआनुपूर्वी हैं, उनका नोकर्म अपना-अपना विग्रहगतिरूप क्षेत्र ही है, इतना विशेष जानना चाहिए। .... थिरजम्यम्य शिराभिररसफ़ाहिरादीणि सुहजुगस्स सुहं । असुहं देहावयवं सरपरिणदपोग्गलाणि सरे॥८३ ।। अर्थ - स्थिरप्रकृति का नोकर्मद्रव्य अपने-अपने स्थान पर स्थित रहने वाला रस-रुधिरादि है और अस्थिरप्रकृति का नोकर्म अपने-अपने स्थान से चलायमान अर्थात् परिणमनरूप रस-रुधिरादिक है। शुभप्रकृति का नोकर्म शरीर के सुन्दर अर्थात् नाभि से ऊपर के अवयव हैं। तथा अशुभप्रकृति का नोकर्म शरीर के अशुभ अर्थात् नाभि से नीचे के अवयव हैं। स्वरनामकर्म का नोकर्म सुस्वर-दुःस्वररूप से परिणमित भाषा-वर्गणारूप पुद्गलस्कन्ध है। गोत्र तथा अन्तरायकर्म के उत्तरभेदों के नोकर्म कहते हैं - उच्चस्सुच्चं देहं णीचं णीचस्स होदि णोकम्मं । दाणादिचउक्काणं विग्घगणगपुरिसपहुदी हु ।।८४॥ अर्थ - उच्चगोत्र का नोकर्मद्रव्य परम्परागत (साधु आचरण) कुल में उत्पन्न हुआ शरीर है। तथा इससे विपरीत नीचगोत्र का नोकर्म है। दानादि चार अन्तरायों का नोकर्म दानादि में विघ्न करने वाले पर्वत, नदी, पुरुष, स्त्री आदि जानना चाहिए। विरियस्स य णोकम्मं रुक्खाहारादिबलहरं दव्वं । इदि उत्तरपयडीणं णोकम्मं दव्वकम्मं तु ॥८५॥ अर्थ - वीर्यान्तराय का नोकर्म रुक्षआहार आदि बलनाशक पदार्थ है। इस प्रकार उत्तरप्रकृतियों के नोकर्मद्रव्य का कथन किया । अब आगे नोआगमभावकर्म को कहते हैं - णो आगमभावो पुण सगसगकम्मफलसंजुदो जीवो। पोग्गलविवाइयाणं णस्थि खुणोआगमो भावो॥८६ ।।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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