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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४४ अथानन्तर आयुकर्म एवं गतिनामकर्म के नोकर्म कहते हैं -
णिरयायुस्स आणट्टाहारी ससाणभट्ट मण्णादी।
गदिणोकम्मं दव्वं चउग्गदीणं हवे खेत्तं ॥७८ ।। अर्थ - नरकायु का नोकर्म अनिष्ट आहार है। शेष तीनआयु का नोकर्म इन्द्रियों को प्रिय लगनेवाले अन्नपानादि हैं और सामान्य से चारों गतियों का नोकर्म चारगतिरूप क्षेत्र अर्थात् 'योनिस्थान'
है।
अब नामकर्म के उत्तरभेदों के नोकर्म कहते हैं -
णिरयादीण गदीणं णिरयादी खेत्तयं हवे णियमा।
जाईए णोकम्मं दबिंदियपोग्गलं होदि ॥७९॥ अर्थ - नरकादि चारगतियों का नोकर्म नियम से नरकादि गतियों का अपना-अपना क्षेत्र (योनि । स्थान) है। (यद्यपि गतियों का उदय नारक आदि पर्याों में निमित्त है तथापि वे पर्यायें अन्यत्र नहीं होती इसलिए उनका नोकर्म उन-उनका क्षेत्र ही होना चाहिए। इसके लिए गाथा में नियम शब्द दिया है।) तथा जातिकर्म का नोकर्म द्रव्येन्द्रियरूप पुद्गल की रचना है।
एइंदियमादीणं सगसगदबिंदियाणि णोकम्मं ।
देहस्स य णोकम्मं देहुदयजयदेहखंधाणि ।।८० ॥ अर्थ - एकेन्द्रियादि पाँचजाति के नोकर्मद्रव्य अपनी-अपनी द्रव्येन्द्रियाँ हैं तथा शरीरनामकर्म के नोकर्म शरीरनामकर्म के उदय से उत्पन्न हुए अपने-अपने शरीर की स्कन्धरूपपुद्गलवर्गणाएँ जानना चाहिए।
ओरालियवेगुब्वियआहारयतेजकम्मणोकम्मं ।
ताणुदयजचउदेहा कम्मे विस्संचयं णियमा॥८१ ।। अर्थ - औदारिक-वैक्रियक-आहारक-तैजसशरीरनामकर्म के नोकर्म अपने-अपने उदय से | प्राप्त हुई शरीरवर्गणाएँ हैं। कार्मणशरीर का नोकर्मद्रव्य विनसोपचय (कर्मरूप होने योग्य वर्गणा) हैं।
बंधणपहुदि समण्णियसेसाणं देहमेव णोकम्मं । णवरि विसेसं जाणे सगखेत्तं आणुपुव्वीणं ॥८२ ।।