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________________ ܀ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ७९६ विशेषार्थ - अङ्कसन्दृष्टि द्वारा कथन करते हैं आयुकर्मकी स्थिति संख्यातपल्यप्रमाण जितने भेद हैं उसकी सहनानी १६ हैं, जघन्यस्थितिके योग्य असंख्यात लोकप्रमाण अध्यवसायस्थानों की सहनानी २२, द्वितीयादि स्थितिमें आवलीके असंख्यातवें भागप्रमाण गुणकारकी सहनानी ४ है। नानाजीवकी अपेक्षा अधस्तनस्थितिके बन्धमें कारणरूप अध्यवसायस्थान और उपरितनस्थितिके बन्धमें कारणरूप अध्यवसायस्थानों में समानता भी है अतः "यही अनुकृष्टिविधान सम्भव है, क्योंकि उपरितन व अधस्तन स्थितिके बन्धमें कारणरूप अध्यवसायस्थानादिकी समानता ही यहाँ अनुकृष्टि कहलाती है। इसलिये यहाँ अनुकृष्टिके गच्छ का प्रमाण अंकसन्दृष्टिमें ४ है सो स्थितिकी रचना तो ऊपर-ऊपर तथा एक-एकस्थिति-रचनाके बराबर अनुकृष्टिरचना जानना । जघन्यस्थितिकी अनुकृष्टिमें चयका प्रमाण १ और सर्वचयका जोड़रूप चयधन ६ है । इस चयधन ६ को प्रथमस्थितिसम्बन्धी द्रव्य २२ में से घटानेपर ( २२-६) १६ शेष रहे। इसको अनुकृष्टिगच्छ ४ का भाग देनेपर ( १६:४) लब्ध ४ आए सो यह जघन्यस्थितिमें जघन्य अनुकृष्टिका खण्ड जानना । इससे आगे उत्कृष्टखण्डपर्यन्त एक - एकचय अधिक जानना । अर्थात् द्वितीय तृतीय - चतुर्थखण्डका प्रमाण क्रमशः ५-६ व ७ जानना । इस प्रकार चारों खण्डोंका जोड़ (४+५+६+७) २२ होता है। द्वितीयस्थिति भेदमें द्रव्य (२२) के चौगुणे (८८) अध्यवसाय हैं। इनमें से एकभाग (२२) को पृथक् ग्रहणकर प्रथम, द्वितीय व तृतीय अनुकृष्टिखण्डों में क्रमले ५-६ व ७ देनेसे शेष जो चार रहे वे तथा बहुभागरूप २२ के तिगुने (६६) उत्कृष्ट (चतुर्थ) खण्डमें देनेसे अन्तिमखण्डमें द्रव्य (६६+४) ७० हुआ। तृतीयस्थितिभेदमें २२ के दोबार चौगुणे अर्थात् २२०४ = ८८४ = ३५२ अध्यवसाय हैं । ३५२ में २२ के चौगुने (८८) रूप एकभाग पृथक् ग्रहण कर अवशेष २२ के चौगुने के तिगुने अर्थात् २६४ अन्तिम (चतुर्थ) खण्ड में देना तथा पृथक् ग्रहण किये हुए चारगुणे २२ (८८) में से २२ पृथक् ग्रहणकरके अवशेष २२ का तिगुना (६६) रहा सो यह द्रव्य उपान्तखण्ड (तृतीयखण्ड) में देना तथा जो २२ पृथक् रखे थे उनमेंसे प्रथम व द्वितीय खण्डमें तो ६ व ७ एवं तृतीय व चतुर्थखण्डमें पूर्वोक्त ६६ व २६४ में क्रमशः ४ व ५ मिलानेसे ७० व २६९ हुए। (चारोंखण्डों में क्रमसे ६ ॥७ ॥७० | २६९ रूप द्रव्य जानना) चतुर्थ स्थितिभेदमें २२ को तीनबार चौगुणा करनेपर (२२०४= ८८x४= ३५२४४ = १४०८ ) द्रव्य है। यहाँ २२ का दोबार चौगुणा ( ३५२) पृथक् ग्रहणकर अवशेष २२ के दोबार चौगुणेको तिगुना करनेसे (२२×४=८८x४ = ३५२४३) १०५६ हुए सो यह चतुर्थखण्डमें देना तथा २२ का दोबार चौगुणा (३५२) पृथक् रखा था। उसमेंसे एकभाग २२ से चारगुना (८८) पृथक् ग्रहणकर अवशेष चार गुणे २२ के तिगुने ( २६४ ) उपान्त (तृतीय) खण्डमें देना तथा चारगुणा २२ (८८) पृथक् रखे थे। उसमें एकभागरूप २२ पृथक् रखकर अवशेष तिगुना २२ (६६) द्वितीय खण्डमें देना एवं जो २२ पृथक् ग्रहण किये थे उनमें से सात प्रथमखण्डमें तथा ४-५ व ६ क्रमसे द्वितीय तृतीय व चतुर्थखण्डके प्रमाणमें मिलानेपर चारोंखण्डसम्बन्धी सर्वद्रव्य क्रमसे ७।७० | २६९ | १०६२ । जानना । इसी क्रमसे ५वें, छठे,
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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