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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७९५ .. निषेकोंमें एक-एकचय अधिक होकर एककम गुणहानि का प्रमाण ७ सो इतने चय मिलनेसे (९+७) १६ हुए सो यह अन्तिमनिषेक जानना। इसप्रकार द्वितीयादि गुणहानिमें द्रव्य, चय और निषेक दूना-दूना होता है। अन्तिमगुण-हानिमें प्रथमगुणहानिके द्रव्य १०० को अन्योन्याभ्यस्तराशिके आधे ३२ से गुणा करनेपर ३२०० तो द्रव्य जानना, इसको गच्छके प्रमाण ८ का भाग देनेपर मध्यधन ४०० आया। इसे एककम गुणहानिके आधेसे हीन दोगुणहानिके प्रमाण १२६ से भाग देनेपर ३२ आया सो चय जानना। इसको एकअधिक गुणहानिके प्रमाण ९ से गुणा करनेपर २८८ हुआ सो प्रथमनिषेक जानना । द्वितीयादि निषेकोंमें एक-एक चय मिलकर एक-कम गुणहानिप्रमाण सात चय मिलनेसे ५१२ हुआ, इसे अन्तिमनिषेक जानना। इस प्रकार अंकसहनानी द्वारा कथन किया। यहाँ भी प्रथमगुणहानिके प्रथमनिषेक अध्यवसायस्थान जघन्यस्थितिको कारण हैं और द्वितीयादिनिषेकप्रमाण जो अध्यवसायस्थान हैं वे एकएकसमयअधिक स्थिति के लिये कारण जानना। इसीप्रकार अन्तिमगुणहानिके अन्तिमनिषेकप्रमाण स्थितिबंधाध्यवसायस्थान उत्कृष्टस्थितिके लिये कारण जानना । आगे जघन्य चय का कथन करते हैं लोगाणमसंखपमा, जहण्णउहिम्मि तम्हि छट्ठाणा। ठिदिबंधज्झवसाणट्टाणाणं होंति सत्तण्हं ।।९५२ ।। अर्थ - आयुकर्मके बिना शेष सातकर्मोंके स्थितिबंधाध्यवसायस्थानोंके जघन्यस्थानके ऊपर असंख्यातलोकप्रमाण छहस्थानपतित वृद्धि होती है। विशेषार्थ - अनन्तवेंभागवृद्धि, असंख्यातवेंभागवृद्धि, संख्यातवेंभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि, अनन्तगुणवृद्धि, ये छह वृद्धियाँ, छहस्थानपतितवृद्धियाँ होती हैं। स्थितिबंधाध्यवसायस्थानोंके जघन्यस्थानके ऊपर असंख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानपतितवृद्धि हो जानेपर दूसरा स्थान होता है। यह वृद्धिका कथन अविभागोंके प्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा है, क्योंकि संख्याकी अपेक्षा अनन्त-भाग व अनन्तगुणीवृद्धि सम्भव नहीं है। आगे आयुकर्मके स्थितिबंधाध्यवसायस्थानोंमें विशेषता बताते हैं आउस्स जहण्णट्ठिदिबंधणजोग्गा असंखलोगमिदा। आवलिअसंखभागेणुवरुवरिं होंति गुणिदकमा।।९५३॥ अर्थ - आयुकर्मके सर्वजघन्यस्थितिबन्धके योग्य अध्यवसायस्थान असंठ्यातलोकप्रमाण है उससे आगे-आगे उत्कृष्टस्थितिपर्यन्त क्रमसे आवलोके असंख्यातवें- असंख्यातभागसे गुणित स्थान जानना चाहिए।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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