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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७७१
रहनेपर उदीरणा भी नहीं होती, किन्तु प्रथमस्थितिके अन्तिमसमयतक स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात सम्भव है, क्योंकि वहाँ पर अन्तिमस्थितिबन्ध के साथ उनकी परिसमाप्ति देखी जाती है। इसप्रकार प्रथमस्थिति की समाप्ति के साथ-साथ अनिवृत्तिकरणकाल समाप्त हो जाता है।
नोट - अधःकरण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण का विस्तारपूर्वक कथन लब्धिसार ग्रन्थ के उपशमसम्यक्त्व नामक प्रकरण में किया गया है। अतः इन तीनों करणोंका विशेषस्वरूप जाननेके लिए लब्धिसार ग्रंथ, जो आचार्य शिवसागरग्रन्थमाला से ही प्रकाशित हुआ है, देखना चाहिए।
इतिश्री आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती विरचित गोम्मटसारकर्मकाण्ड की 'सिद्धान्तज्ञानदीपिका' नामा हिन्दीटीका में 'त्रिकरणचूलिका' नामक आठवाँ अधिकार पूर्ण हुआ।
अथ कर्मस्थितिरचनासद्भावाधिकार
अब आचार्य सिद्धोंको नमस्कार करते हुए कर्मस्थितिकी रचनाका सद्भाव कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं
सिद्धे विसुद्धणिलये, पणट्टकम्मे विणट्ठसंसारे।
पणमिय सिरसा बोच्छं, कम्मट्टिदिरयणसम्भावं ॥९१३ ।। - अर्थ - प्रकृष्टरूपसे नष्ट हुए हैं धाति-अघातिकर्म जिनके, विशेषरूपसे नष्ट किया है चतुर्गतिभ्रमणरूप संसार जिन्होंने इसलिए जिनका आत्मप्रदेशोंमें स्थान है ऐसे सिद्ध-परमेष्ठी को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करके कर्मस्थिति रचनाका सत्तारूप कथन करता हूँ। यह कथन प्रसंगवश गोम्मटसार जीवकाण्डके योगाधिकारमें एवं पहले कर्म-काण्डके बन्ध-उदय-सत्त्वाधिकार में कहा है।
कम्मसरूवेणागददव्वं, ण य एदि उदयरूवेण ।
रूवेणुदीरणस्स य, आबाहा जाव ताव हवे ॥९१४॥ अर्थ - कर्मस्वरूपसे परिणत हुआ जो कार्मणद्रव्य जब तक उदय या उदीरणारूप नहीं होता तब तक का काल आबाधा कहलाता है।