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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७७०
अथानन्तर अनिवृत्तिकरण का स्वरूप कहते हैं
एकम्हि कालसमए, संठाणादीहिं जहा णिवटंति । णणिवटंति तहविय, परिणामेहिं मिहो जे हु॥९११ ।। होति अणिवाटणों से, पडिसमयं जास्समेक्कपरिणामो।
विमलयरझाणहुदवहसिहाहि णिहकम्मवणा ।९१२ ।। अर्थ - जो जीव अनिवृत्तिकरणकाल के विवक्षित एक समय में जैसे शरीर के आकार व वर्णादि से भेदरूप हो जाते हैं उस प्रकार परिणामों से भेदरूप नहीं होते तथा जिसकरण में प्रतिसमय जीवों के एक रूप ही परिणाम हैं वे परिणाम अतिशय निर्मलध्यान रूप अग्नि की शिखासे जलाए हैं कर्मरूपी वन जिन्होंने ऐसे अनिवृत्तिरूप होते हैं।
विशेषार्थ - इसकरणमें समान समयवर्ती जीवों के परिणाम एक समान ही होते हैं अन्यरूप सर्वथा नहीं होते। इसी प्रकार द्वितीयादि समयवर्ती जीवों के परस्पर समानता जानना। अनिवृत्तिकरणकालप्रमाणरूप गच्छ सो अङ्कसन्दृष्टिमें ४ रूप है और अर्थ-सन्दृष्टि में वही काल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है।
अनिवृत्तिकरणमें प्रविष्ट होनेके प्रथमसमय से ही अपूर्वकरणके अन्तिम स्थिति-काण्डकसे विशेषहीन अन्य स्थितिकाण्डकका आरम्भ होता है। पूर्वके स्थितिबन्धसे पल्योपमके संख्यातवेंभागप्रमाणहीन अन्य स्थितिबन्धका भी आरम्भ होता है तथा घात करनेसे शेष रहे अनुभाग के अनन्तबहुभागप्रमाण अनुभागकाण्डकका भी वहीं पर ग्रहण होता है, किन्तु गुणश्रेणिनिक्षेप पूर्व का ही रहता है। इसप्रकार हजारों स्थितिकाण्डकोंके द्वारा अनिवृत्तिकरणकालके संख्यातबहुभाग अन्तर किया जाता है। विवक्षित कर्मों की अधस्तन और उपरितन स्थितियोंको छोड़कर मध्यकी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण स्थितियोंके निषेकोंका परिणाम विशेषके कारण अभाव होनेको अन्तरकरण कहते हैं। उससमय जितना स्थितिबन्ध काल या स्थितिकाण्डकोत्कीर्णकाल है उतने कालके द्वारा अन्तर हो जाता है अर्थात् गुणश्रेणिनिक्षेपके अग्रान (गुणश्रेणिशीर्ष) से लेकर नीचे गुणश्रेणिआयामके संख्यातवेंभागप्रमाण स्थितिनिषेकोंका खण्डन (अभाव) हो जाता है। अन्तरसे नीचेकी कर्मस्थिति अर्थात् प्रथमस्थितिसे और द्वितीयस्थिति (अन्तरसे ऊपरकी कर्म-स्थिति) से तबतक आगाल प्रत्यागाल होता रहता है जबतक प्रथमस्थितिमें आवलि-प्रत्यावलि शेष रहती है। द्वितीयस्थिति के कर्मपरमाणुओंका प्रथमस्थितिमें अपकर्षणवश आना आगाल है। प्रथमस्थितिके कर्मपरमाणुओं का द्वितीयस्थितिमें उत्कर्षणवश जाना प्रत्यागाल है। प्रथमस्थितिमें आवलि और प्रत्यावलि शेष रहनेपर विवक्षित कर्मोंकी गुणश्रेणि, आगाल व प्रत्यागाल नहीं होता, किन्तु प्रत्यावलिमें से ही उदीरणा होती है। आवलिप्रमाण प्रथमस्थितिके शेष