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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७६५ ऊपर किसीके साथ भी सदृश नहीं है। पुनः प्रथमसमयसम्बन्धी द्वितीयखण्ड (४०) तथा द्वितीयसमयका प्रथमखण्ड (४०) दोनों ही सदृश हैं। तथैव प्रथमसमयका तृतीयखण्ड (४१) और द्वितीयसमयका द्वितीयखण्ड (४१) ये दोनों भी सदृश हैं। इसीप्रकार आगे चलकर प्रथमसमयवर्ती अन्तिमखण्ड तथा द्वितीयसमयका विचरमखण्ड ये दोनों सदृश हैं। तथैव द्वितीयसमयसम्बन्धी परिणामखण्डोंका और तृतीयसमय के परिणामखण्डोंका सन्निकर्ष करना चाहिए। इसीप्रकार ऊपर भी तदनन्तर पिछले (पूर्व) के साथ सन्निकर्षविधि जानकर कथन करना चाहिए। परस्थान अल्पबहुत्वका कथन इसप्रकार है- अधःप्रवृत्तकरणके प्रथमसमयमें जघन्य विशुद्धि (१) सबसे स्तोक हैं, क्योंकि अधःप्रवृत्तकरणमें इससे अल्प अन्यस्थान नहीं पाया जाता है। उससे द्वितीयसमयमें जघन्यविशुद्धि (४०) अनन्तगुणी है, क्योंकि प्रथमसमयके जघन्यविशुद्धिस्थानसे षटूस्थानक्रम द्वारा असंख्यातलोकमात्र विशुद्धिस्थानों को उल्लंघनकर स्थित हुए द्वितीयखण्डके जघन्यविशुद्धिस्थानका द्वितीय समयमें जघन्यपना देखा जाता है इसप्रकार अन्तर्मुहूर्त (प्रथमनिर्वर्गणाकाण्डकके अन्त) तक जघन्य विशुद्धिका ही प्रतिसमय अनन्तगुणित क्रमसे कथन करना चाहिए, उससे (प्रथमनिर्वर्गणाकाण्डक) प्रथमसमयमें उत्कृष्टविशुद्धि (१६२) अनन्तगुणी है, क्योंकि इससे अनन्तरपूर्व जो जघन्यविशुद्धिक्रम प्राप्त है वह तो अध:प्रवृत्तकरणके प्रथमसमयके विशुद्धस्थानोंके अन्तिमखण्डकी आदि-विशुद्धि है और उसी अन्तिमखण्डकी उत्कृष्टविशुद्धि उक्त आदि विशुद्धिसे छहस्थान क्रमसे वृद्धिरूप असंख्यातलोकप्रमाण परिणामस्थानोंको उल्लंघकर अवस्थित है। प्रथमनिर्वर्गणाकाण्डकके प्रथमसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि (१६२) से द्वितीयनिर्वर्गणाकाण्डक के प्रथम खण्ड की जघन्यविशुद्धि (१६३) अनन्तगुणी है, क्योंकि प्रथमसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि द्वितीयसमयके द्विचरमखण्डके अन्तिमपरिणामके सदृश होकर उर्वकपनेसे अवस्थित है और द्वितीयनिर्वर्गणाकाण्डककी जघन्यविशुद्धि अष्टांकरूपसे अवस्थित है इसलिए अनन्तगुणी है, इससे द्वितीयसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि (२०५) अनन्तगुणी है, क्योंकि पूर्व की जघन्यविशुद्धि (१६३) अधःप्रवृत्तकरणके दूसरे समयके अन्तिमखण्डके जघन्यपरिणाम स्वरूप है और उससे असंख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानोंको उल्लंघनकर स्थित यह द्वितीयसमयके अन्तिमखण्डकी उत्कृष्टविशुद्धि है इसलिए यह उससे अनन्तगुणी है। इस पद्धतिसे अन्तर्मुहूर्तकालप्रमाण एक निर्वर्गणाकाण्डकको अवस्थितकर उपरिम और अधस्तन जघन्य और उत्कृष्ट परिणामोंका अल्पबहुत्व करना चाहिए | यह सब अल्पबहुत्व निर्वर्गणाकाण्डकोंको क्रमसे उल्लंघनकर पुनः द्विचरमनिर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिमसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि (६९०) से अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिमसमयकी जघन्यविशुद्धि (६९१) अनन्तगुणी है; उससे अन्तिमनिर्वर्गणाकाण्डकके प्रथमसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि (७४४) अनन्तगुणी है। अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिमसमयपर्यन्त इसप्रकार प्रकृत अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा करनी चाहिए। इसकी सन्दृष्टि इसप्रकार है
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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