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________________ गोवा कर्मक १०००००००००००, १००००००००००००, १०००००००००० १०००००००००००, १०००००००००, १००००००००००, १००००००००, १०००००००००, १०००००००, १००००००००, १०००००० १०००००००, १०००००, १००००००. १००००, 4,00000, १०००००००००००००, १०००००००००००० १००००००००००००, %0000000000000 १०००००००००००, १००००००००००, १०००००००००, १००००००००, १०००००००, १००००००, सन्दृष्टि के अनुसार अनुकृष्टिकी प्ररूपणा इसप्रकार है- अधःप्रवृत्तकरणके प्रथमसमयसम्बन्धी प्रथमखण्ड के परिणाम उपरिमसमयसम्बन्धी परिणामों में से किन्हीं भी परिणामोंके समान नहीं होते, वहीं पर दूसरे खण्डके परिणाम (४०) दूसरे समयके प्रथमखण्ड (४०) के परिणामोंके समान होते हैं । इसीप्रकार प्रथमसमयके तृतीयादि खण्डोंके परिणामोंका भी तृतीयादि समयोंके प्रथमखण्डके परिणामोंके साथ क्रमसे पुनरुक्तपना तबतक जानना चाहिए जबतक प्रथमसमयसम्बन्धी अन्तिमखण्ड के परिणाम (४३) प्रथमनिर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिमसमयके प्रथमखण्ड के साथ पुनरुक्त होकर समाप्त होते हैं। ५०००००००००००० १००००००००००० १०००००००००० १००००००००० १०००००००० १००००००० इसीप्रकार अधः प्रवृत्तकरणके द्वितीयादि समयोंके परिणामखण्डोंको भी पृथक्-पृथक् विवक्षित करके वहाँके द्वितीयादि खण्डगत परिणामोंका विवक्षित समयसे लेकर ऊपर एकसमयकम निर्वर्गणाकाण्डकप्रमाण समयपंक्तियोंके प्रथमखण्डके परिणामोंके साथ पुनरुक्तपनेका कथन करना चाहिए, किन्तु इतनी विशेषता है कि सर्वत्र प्रथमखण्डसम्बन्धी परिणाम अपुनरुक्तपनेसे अवशिष्ट रहते हैं अर्थात् प्रत्येक समय के प्रथमखण्डसम्बन्धी परिणाम अगले समयोंके किसी भी खण्डके परिणामोंके सदृश नहीं होते। इसी प्रकार द्वितीयनिर्वर्गणाकाण्डक परिणामखण्डोंका तृत्तीयनिर्वर्मणाकाण्डकके परिणामखण्डोंके साथ पुनरुक्तपना जानना चाहिए, किन्तु वहाँपर भी प्रथमखण्ड के परिणाम अपुनरुक्तरूपसे अवशिष्ट रहते हैं। इसी क्रमसे तृतीय - चतुर्थ पंचमादि निर्वर्गणाकाण्डकों के भी अनन्तर उपरिमनिर्वर्गणाकाण्डकोंके साथ पुनरुक्तपना वहाँ पर्यन्त ले जाना चाहिए जबतक द्विचरमनिर्वर्गणाकाण्डकके प्रथमादि समयोंके सर्व परिणामखण्ड, प्रथमखण्डको छोड़कर अन्तिमनिर्वर्गणाकाण्डक परिणामोंके साथ पुनरुक्त होकर समाप्त होते हैं। अंतिमनिर्वर्गणाकाण्डकके स्वस्थानमें पुनरुक्त - अपुनरुक्तपनेका अनुसन्धान परमागम के अविरोधपूर्वक करना चाहिये । अथवा यहाँ पर इसप्रकार सन्निकर्ष करना चाहिए- प्रथमसमयमें जो प्रथमखंड ( ३९ ) है वह
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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