________________
१७० १६६
चतुर्थ निर्वर्गणाकाण्डक | तृतीय निर्वर्मणाकाण्डक | द्वितीय निर्वर्गणाकाण्डक | प्रथम निर्वर्गणाकाण्डक १६ समयवर्ती | २२२ | २१८ २१४ | २१० | २०६ / २०२ | १९८ ११९४ १९० | १८६ | १८२ | १७८ | १७४ ११७० | १६२ परिणाम सं.
प्रथम खण्ड
४८ ४७ ४६
द्वितीय खण्ड
१०। ४९४८
तृतीय खण्ड
चतुर्थ खण्ड | ५७
५६ | ५५/ ५४ ५३ |
४६ | ४५ | १४ | ४३
गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७६३
अध:प्रवृत्तकरणके प्रथमसमयसे लेकर यथाक्रम विशेष अधिकके क्रमसे रचना करके प्रथमसमयके परिणामोंके (अध:प्रवृत्तकरणकालके संख्यातवेंभागप्रमाण) अन्तर्मुहूर्तके जितने समय हैं, मात्र उतने खण्ड करना चाहिये सो एक निर्वर्गणाकाण्डकका उतना ही प्रमाण है। विवक्षित समयके परिणामोंकी अनुकृष्टिका विच्छेद जितने स्थान ऊपर जाकर होता है वह निर्वर्गणाकाण्डक कहा जाता है। प्रथमसम्मके परिणामसम्बन्धी वे खण्ड परस्पर सदृश नहीं होते; विसदृश होते हैं क्योंकि विशेष अधिक क्रमसे अवस्थित हैं। प्रथमसमयसम्बन्धी पग्गिामोंमें अन्तर्मुहुर्तका भाग देनेपर जो लब्ध प्राप्त हो वह विशेषअधिक का प्रमाण है। पुनः प्रथमखण्डको छोड़कर इन्हीं परिणामखण्डोंको परिपाटीका उल्लंघनकरके दूसरे समयमें स्थापित करना चाहिए, किन्तु इतनी विशेषता है कि इस द्वितीयसमयमें असंख्यातलोकप्रमाण अन्य अपूर्वपणाम भी होते हैं जो विशेष होते हैं, जैसे उपर्युक्तसन्दृष्टि में जो ४३ हैं उन्हें यहाँ अन्तिमखण्डरूपसे स्थापित करना चाहिए। इसप्रकार स्थापित करनेपर दूसरे समयमें भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण परिणामखण्ड प्राप्त होते हैं; तथैव तृतीयादि समयों में भी परिणामखण्डोंकी रचना अध:प्रवृत्तकरणके अन्तिमसमयतक यथाक्रम करनी चाहिए। इनकी सन्दृष्टि निम्न प्रकार भी की गई है
१. ज.ध.पु. १२ पृ. २५४; ११४1