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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ७६० से गुणनेसे (३०x१६) ४८० संबंध आया सो यह उत्तरधन है। इस उत्तरधनको सर्वधन ( ३०५२) में से घटानेपर (३०७२- ४८०) २५९२ शेष रहे सो यह आदिधन है तथा प्रमाणराशि ४८०, इच्छाराशि एकशलाका और फलराशि २५९२ । यहाँ फलराशिसे इच्छाराशिको गुणाकरके प्रमाणराशिका भाग देनेपर ( २५९२१९ / ४८०) २७ / ५ शलाका हुईं । पुनश्च प्रमाणराशि २७/५ शलाका, फलराशि २५९२ (आदिधन) और इच्छाराशि एक शलाका है । फलराशिसे इच्छाराशिको गुणाकर प्रमाणराशिका भाग देनेपर (२५९२×१/१×५/२७ ) ४८० चयधन प्राप्त हुआ और यह आदिधनके संख्यातवेंभागप्रमाण है इसे उत्तरधन भी कहते हैं । उभयधणे संमिलिदे, पदकदिगुणसंखरूवहदपचयं । सव्वधणं तं तम्हा, पदकदिसंखेण भाजिदे पचयं ॥ ९०२ ॥ अर्थ आदिधन और प्रचवधनको मिलानेपर ( २५९२+४८०) सर्वधन होता है अथवा गच्छ वर्गको संख्यातसे गुणाकर पुन: चयसे गुणा करनेपर ( १६०३४४) अर्थात् (२५६०३x४) सर्वधनका प्रमाण (३०७२ ) प्राप्त होता है तथा सर्वधनको गच्छ ( १६ ) के वर्ग अर्थात् २५६ व संख्यातकी सहनानी ३ से भाग देनेपर (३०७२/२५६०३) ४ लब्ध आया सो यह प्रचयका प्रमाण है। - चयधणहीणं दव्वं, पदभजिदे होदि आदिपरिमाणं । आदिम्हि चये उड्डे, पडिसमयधणं तु भावाणं ॥ ९०३ ॥ अर्थ - सर्वधनमें से चयधनको घटानेपर आदिधन प्राप्त होता है । उसको पद (गच्छ ) का भाग देनेपर प्रथमसमयसम्बन्धी विशुद्धपरिणामों का प्रमाण प्राप्त होता है। इसको आदिप्रमाण भी कहा है। उस प्रथमसमय के प्रमाण चय-चयकी वृद्धि करनेपर प्रत्येकसमयसम्बन्धी धन अर्थात् द्वितीयादि समयोंके परिणामोंका प्रमाण प्राप्त होता हैं। विशेषार्थ - असन्दृष्टिमें सर्वधन ३०७२ में से चयधन ४८० घटानेपर २५१२ आदिधन होता है। इसमें पद ( गच्छ ) १६ का भाग देनेपर १६२ आया सो यह प्रथमसमय के विशुद्धपरिणामोंका प्रमाण जानना। इसमें एक चयका प्रमाण ४ मिलानेसे (१६२+४) १६६ हुए सो ये द्वितीय समय के विशुद्धपरिणामोंका प्रमाण है। इसमें एक चय और मिलानेसे (१६६+४) १७० हुए सो तृतीयसमयके विशुद्धपरिणाम हैं। इसप्रकार आगे-आगे एक-एक चय बढ़ानेपर समय-समयप्रति अधः प्रवृत्तकरणके विशुद्धपरिणामोंका प्रमाण प्राप्त होता है । अधः प्रवृत्तकरणपरिणामोंका प्रमाण इसप्रकार है१६२।१६६ । १७० | १७४|१७८ ।१८२ । १८६ | १९० | १९४ | १९८।२०२ । २०६ |२१० | २१४ | २१८।२२२ |
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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