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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७५९ अथानन्तर अधःप्रवृत्तकरण परिणामोंकी संख्याको समझानेके लिये अंकसंदृष्टि द्वारा कथन करते हैं बावत्तरितिसहस्सा, सोलस चउ चारि एक्कयं चेव । धणअद्धाणविसेसे, तियसंखा होदि संखेज्जे ॥९०० ।। अर्थ – यहाँ अङ्कसन्दृष्टिमें सर्वधन ३०७२, अधः प्रवृत्तकरणकालका प्रमाण १६, तिर्यग्गच्छ (अनुकृष्टिखण्ड) ४, ऊर्ध्वरूप वृद्धिका प्रमाण विशेष ४, तिर्यग्रूप अनुकृष्टिमें वृद्धिका प्रमाण १ और वृद्धि अर्थात् चयको सिद्धकरनेके लिये संख्यातकी सहनानी ३ का अंक समझना चाहिये। विशेषार्थ - यहाँ करणके सर्वसमयसम्बन्धी परिणामोंका समूह तो सर्वधन (३०७२) है तथा करणकालके जितने समय हों उनको ऊपर-ऊपर लिखना सो उसकालके जितने समय हो वही ऊर्ध्वगच्छ अथवा पद है एवं एकसमयमें किसी जीवके कितने परिणाम पाये जाते हैं, अन्यजीवके कितने परिणाम पाए जाते हैं ? इसप्रकारसे एक समयमें जितने खण्ड हों उनकी विवक्षित समयकी रचनाके बराबर रचना करनेपर उन खण्डोंका जो प्रमाण हो वह अनुकृष्टिके तिर्यग्गच्छ या पदका परिमाण है तथा प्रतिसमय जितने परिणाम क्रमसे बढ़ते हैं वह ऊर्ध्व चय (प्रचय-उत्तर या विशेष) है। प्रत्येकखण्डमें जितनी वृद्धि होती है वह तिर्यग्रूप अनुकृष्टिका विशेष-चय-प्रचय या विशेष है तथा चय का प्रमाण जाननेके लिये जिस संख्यातका भाग दिया जाता है उसकी सहनानी अंकसंदृष्टिमें ३ है। आदिधणादो सव्वं, पचयधणं संखभागपरिमाणं । करणे अथापवत्ते, होदित्ति जिणेहिं णिद्दिट्ट ॥९०१॥ अर्थ – अधःप्रवृत्तकरणमें सर्व प्रचयधन आदिधनके संख्यातवेंभागप्रमाण है, ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। विशेषार्थ – सर्वसमयसम्बन्धी चयको जोड़ देनेपर जो प्रमाण हो सो प्रचयधन है, प्रचयधनको उत्तरधन भी कहते हैं तथा चयरहित सर्वसमयसम्बन्धी धन आदिधन है सो “पदकृत्या संख्यातेन सर्वधने भक्ते ऊर्ध्वचयप्रमाणं स्यात्' अर्थात् पदकी कृति (वर्ग) और संख्यातका भाग सर्वधनमें देनेपर ऊर्ध्वचयका प्रमाण होता है अतः पद (गच्छ) १६ की कृति (वर्ग) १६४१६-२५६ और संख्यातकी सहनानी ३ सो इसका भाग सर्वधन ३०७२ में देनेपर ३०७२/२५६४३-४ लब्ध आया सो यह ऊर्ध्वप्रचयका प्रमाण है तथा "व्येकपदार्धघ्न चयगुणो गच्छ उत्तरधनं" इस करणसूत्रके अनुसार एककम पदके आधे को चयसे और गच्छसे गुणा करनेपर प्रचयधन होता है अत: एककम गच्छ (१५) का आधा साढ़े सात, इसको चय (४) से गुणा किया तो (१५/२४४) ३० आया। पुन: गच्छ (१६)
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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