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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७५२ अण्णाणी हु अणीसो, अप्पा तस्स य सुहं च दुक्खं च । सग्गं णिरयं गमणं, सव्वं ईसरकदं होदि ।।८८० ।। अर्थ – आत्मा अज्ञानी-ज्ञानरहित है, अनाथ है अर्थात् कुछ भी करने में समर्थ नहीं है, उस आत्माका सुख-दुःख, स्वर्ग तथा नरकमें गमनआदि सब ईश्वरकृत है। इसप्रकार ईश्वरका किया सर्वकार्य मानना ईश्वरवाद है। एक्को चेव महप्पा, पूरिसो देवो य सव्ववावी य। सव्वंगणिगूढोवि य, सचेदणो णिग्गुणो परमो ॥८८१ ।।' अर्थ -- संसारमें एक ही महान् आत्मा है, वही पुरुष है, वहीं देव है और वही सभी में व्यापक है, सर्वाङ्गपनेसे अगम्य है, चेतनासहित है, निर्गुणी एवं उत्कृष्ट है; इसप्रकार आत्मस्वरूपसे ही सभीको मानना आसवाक, अर्थ है। ......." जत्तु जदा जेण जहा, जस्स य णियमेण होदि तत्तु तदा। तेण तहा तस्स हवे, इदि वादो णियदिवादो दु॥८८२॥' अर्थ - जो जिस समय जिससे जैसे जिसको नियमसे होता है वह उससमय उससे वैसे उसके ही होता है ऐसा नियमसे सभी वस्तुको मानना नियतिवाद कहलाता है। को करदि कंटयाणं, तिक्खत्तं मियविहंगमादीणं । विविहत्तं तु सहाओ, इदि सव्वं पि सहाओत्ति ॥८८३॥ अर्थ - काँटा आदि जो तीक्ष्ण वस्तु हैं उनको कौन करता है? मृग व पक्षी आदिकोंमें जो अनेक प्रकारपना पाया जाता है उनको कौन करता है ? इसप्रकार प्रश्न होनेपर यही उत्तर मिलता है कि सभीमें स्वभाव ही है ऐसे सबको स्वभावसे ही मानना स्वभाववाद है। इसप्रकार कालादिकी अपेक्षा एकान्तपक्षके ग्रहण करलेनेसे क्रियावाद होता है। आगे अक्रियावाद के भङ्ग दो गाथाओं में कहते हैं णत्थि सदो परदोवि य, सत्तपयत्था य पुण्णपाऊणा । कालादियादिभंगा, सत्तरि चदुपंतिसंजादा ।।८८४ ।। १. प्रा.पं.सं.पू. ५.४७ श्लोक २६। २. प्रा.पं.सं.पृ. ५४७ श्लोक २८ । ३. प्रा.पं.सं.पृ. ५४७; ध.पु.१ पृ. १११। ४. ग्रा.पं.सं.पृ.५४७ श्लोक २४॥
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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