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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ७१९
पूर्वकथित औदयिकभंगसहित तथा असंयतादि चारगुणस्थानोंमें क्षायिकसम्यक्त्व स्थानमें पूर्वकथित औदयिकभंग सहित परसंयोगसे उत्पन्न हुए भंगों को पृथक् करके अपनी-अपनी राशिमं मिलाना चाहिए।
विशेषार्थ - मिथ्यात्व - सासादन गुणस्थानमें औदयिकभावके २०४ भंगों में अचक्षुदर्शनसम्बन्धी २४ भंग (गाथा ८३०) मिलानेसे सर्व (२०४ + २४) २२८ भंग हैं। मिश्र व असंवत गुणस्थानमें औदयिक भावोंके १८० भंगों में (गाथा ८२९) क्षायिकसम्यग्दर्शनसम्बन्धी १०४ भंग (गा. ८३१) मिलानेसे सर्व (१८०+१०४) २८४ भंग हैं। देशसंयतगुणस्थान में औदयिकभावके ७२ भंगों में (गा. ८२९ ) क्षायिकसम्यग्दर्शनसम्बन्धी ३६ भंगों (गा. ८३१) को मिलानेसे सर्व ( ७२+३६) १०८ भंग हैं। प्रमत्तगुणस्थान में औदयिकभावके ३६ भंगोंमें क्षायिकसम्यग्दर्शनसम्बन्धी ३६ भंग मिलानेसे सर्व ( ३६ + ३६) ७२ भंग होते हैं तथा अप्रमत्सगुणस्थान में औदविक्रभाव ३६ भंगों में क्षायिकसम्यग्दर्शनसम्बन्धी ३६ भंगोको मिलानेसे सर्व (३६ + ३६) ७२ भंग जानने चाहिए।
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अब पूर्वगाथाओंमें कथित स्थानगत भंगोंके सम्बन्धमें विशेष कथन १० गाथाओं में
करते हैं
उदयेण चडिदे, गुणगारा एव होंति सव्वत्थ । अवसेस भावठाणेणक्खे संचारिदे खेवा ॥ ८३४ ॥ दुसु दुसु देसे दोसुवि, चउरुत्तरदुसदगसिदिसहिदसदं । बावत्तरि छत्तीसा, बारमपुव्वे गुणिजपमा ||८३५ ॥ बारच उतिदुगमेक्क, थूले तो इगि हवे अजोगित्ति । पुण बार बार सुण्णं, चउसद छत्तीस देसोत्ति ।।८३६ ॥
वामे दुसुदु दुसु तिसु, खीणे दोसुवि कमेण गुणगारा । णव छब्बारस तीसं, वीसं वीसं चउक्कं च ॥ ८३७ ॥ पुणरवि देसोत्ति गुणो, तिदुणभछछक्कयं पुणो खेवा । पुव्वपदे अड पंचयमेगारमुगुतीसमुगुवीसं ॥ ८३८ ।। उगुवीस तियं तत्तो, तिदुणभछछक्कयं च देसोत्ति । चदुसुवसमगेसु गणा, तालं रूऊणया खेवा ||८३९ ॥