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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७१८ है, उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय व सयोगकेवलीगुणस्थानमें शुक्ललेश्याकी अपेक्षा एक-एक ही भग है। इसप्रकार यहाँ अक्षसंचारसे भावोंके परिवर्तन होनेपर जितने भंग होते हैं उतने ही परस्पर गुणाकरनेसे भी भंग होते हैं सो इन भंगों का गुण्यरूपसे स्थापन करना चाहिए |
चक्खूण मिच्छसासणसम्मा तेरिच्छगा हवंति सदा।
चारिकसायतिलेस्साणब्भासे तत्थ भंगा हु ।।८३० ।। अर्थ - चक्षुदर्शनरहित मिथ्यात्व-सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यञ्च ही होते हैं अतः तिर्यञ्चगतिमें नपुंसकवेद, चारकषाय व ३ अशुभलेश्याको परस्पर गुणाकरनेपर (१४४४३) १२ भंग होते हैं।
खाइयअविरदसम्मे चदु सोल बहत्तरी य बारं च ।
तद्देसो मणुसेव य छत्तीसा तब्भवा भंगा॥८३१॥ अर्थ – असंयतक्षायिकसम्यग्दृष्टि के नरकगतिमें तो नपुंसकवेद, चारकषाय व कापोतलेश्याको परस्पर गुणाकरनेसे चार ही भंग हैं; तिर्यञ्चमतिमें पुरुषवेद, चारकषाय और चारलेश्याको परस्पर गुणाकरनेपर १६ भंग; मनुष्यगतिमें तीनवेद, चारकषाय व ६ लेश्याको परस्पर गुणाकरनेपर (३५४४६) ७२ भंग; देवगतिमें पुरुषवेद, चारकषाय व तीन शुभलेश्याकी अपेक्षा (५४३४४) १२ भंग हैं। इसप्रकार सर्व ४+१६+७२+१२-१०४ भंग होते हैं तथा देशसंयती क्षायिकसम्यग्दृष्टि मनुष्य ही होते हैं अत: वहाँ तीनवेद, चारकषाय व ३ शुभलेश्याका परस्पर गुणा करनेसे ३६ भंग हैं।
परिणामो दुवाणो मिच्छे सेसेसु एक्कठाणो दु।
सम्मे अण्णं सम्मं चारित्ते णत्थि चारित्तं ।।८३२ ।। अर्थ - मिथ्यात्वगुणस्थानमें पारिणामिकभावके दो स्थान हैं । जीवत्व-भव्यत्व अथवा जीवत्वअभव्यत्व तथा अवशेषगुणस्थानोंमें जीवत्व-भव्यत्व ऐसा एक ही स्थान है। आगेके गुणस्थानोंमें प्रत्येक, द्विसंयोगी आदि भेद कहनेके लिए कहते हैं कि सम्यक्त्वसहित स्थानमें अन्य सम्यक्त्व नहीं है तथा चारित्रसहित स्थानमें अन्य चारित्र नहीं है अर्थात् जहाँ उपशमसम्यक्त्व है वहाँ वेदक और क्षायिकसम्यक्त्व नहीं है, इसीप्रकार अन्यत्र भी जानना।
मिच्छदुगयदचउक्के अट्ठट्ठाणेण खयियठाणेण।
जुद परजोगजभंगा पुध आणिय मेलिदव्वा हु॥८३३ ।। अर्थ – मिथ्यात्व-सासादनगुणस्थानमें चक्षुदर्शनरहित क्षायोपशमिकसम्बन्धी ८ भावोंके स्थानोंमें
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