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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७०३
विशेषार्थ - एकभंगको प्रत्येक भंग और जिनमें संयोग पाया जाने उनको संयोगी भंग कहते हैं। संयोग दो प्रकारके हैं (५) स्वसंयोग (२) परसंयोग। जहाँ अपने ही किसी एक उत्तरभेदके साथ संयोग हो उसे स्वसंयोग कहते हैं जैसे- औपशमिकसम्यक्त्व का औपशपिकचारिनके साथ अथवा गतिरूप औदयिकभावका दूसरी जातिरूप औदयिकभावके साथ संयोग होना । जहाँ अन्य भावके किसी भेदके साथ संयोग कहा जावे वह परसंयोगी है जैसे- औपशमिकभावके भेदका औदयिकभावके भेदके साथ अथवा औदयिकका क्षायिकभावके साथ संयोग होना। अब गुणस्थानों में मूलभाव और स्व-पर संयोगरूप भङ्गों की संख्या कहते हैं
मिच्छतिये तिचउक्के दो सुवि सिद्धेवि मूलभावा हु।
तिग पण पणगं चउरो तिग दोण्णि य संभवा होति ।।८२१ ।। अर्थ – मिथ्यात्वादि तीन गुणस्थानोंमें ३-३ मूलभाव, असंयतादि चार गुणस्थानोंमें ५-५, उपशमश्रेणीसम्बन्धी चार गुणस्थानोंमें ५-५, क्षपकश्रेणि तथा क्षीणकपाथगुणस्थानमें ४, सयोगी व अयोगी गुणस्थानमें ३-३ तथा सिद्धाम २ मूलभाव पाए जाते हैं।
विशेषार्थ- मिथ्यात्व, सासादन व मिश्र गुणस्थानमें क्षायोपमिक, औदयिक व पारिणामिकरूप तीन-तीन मूलभाव, असंयतसे अप्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त तथा अपूर्वकरण से उपशान्तकषायगुणस्थानपर्यन्त उपशमश्रेणिमें ५, क्षपकश्रेणि तथा क्षीणकषायगुणस्थानमें औपशमिकभाव बिना शेष चार, सयोग व अयोगकेवलीगुणस्थानमें औदयिक, क्षायिक व पारिणामिकरूप तीन-तोन तथा सिद्धोंक क्षायिक व पारिणामिकरूप दो मूलभाव जानने चाहिए।
गुणस्थान की अपेक्षा मूलभावसम्बन्धी सन्दृष्टि
गुणस्थान
मूलभावों की संख्या
मूलभावोंके नाम
मिथ्यात्व
औदयिक-मिश्र व पारिणामिक
सासादन
मिश्र
असंयत
औदयिक-मिश्र व पारिणाभिक औदयिक-मिथ व पारिणामिक औदयिक-क्षायोपशभिक-औपमिक-क्षायिक-पारिणामिक औदविक-क्षायोपशमिक औपशमिक-क्षायिक-पारिणामिक औयिक-क्षायोपशमिक-औपशमिक - क्षायिक-पारिणामिक
देशसंयत
प्रमत्त