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________________ गोम्मटप्सार कर्मकाण्ड-७०२ बंध पडि एयत्तं लक्खणदो हदि तस्स णाणत्तं । तम्हा अमुत्तिभावोऽणेयंतो होदि जीवस्स ।। अर्थात् आत्मा और कर्मबन्धकी अपेक्षा एक हैं तो भी लक्षणकी अपेक्षा भिन्न हैं। इसलिए जीवका अमूर्तत्व अनेकान्तरूप है अर्थात् एक अपेक्षासे अमूर्त और दूसरो अपेक्षासे अमूर्त नहीं है, किन्तु मूर्त है। __ औपशमिकादि पाँच भावों के उत्तरभेदसम्बन्धी सन्दृष्टिभावोंके नाम | उत्तरभेदोंकी संख्या | उत्तरभेदोंके नाम औपशर्मिक क्षायिक क्षायोपर्शामक उपशमसम्यक्त्व और उपशमचारित्र। क्षायिकज्ञान-दर्शन-दान-लाभ-भोग- उपभोग-वीर्य एवं क्षायिकसभ्यक्त्व और क्षायिक चारित्र । मति-श्रुत-अवधि-मन:पर्ययरूप ४ ज्ञान, चक्षु-अचक्षुअबधिरूप ३ दर्शन, कुमति-कुश्रुत-कुअवधि (विभंग) रूप ३ अज्ञान, क्षायोपशमिकदान-लाभ-भोग- उपभोग और वीर्य, वेदकसम्यक्त्व, सरागचारित्र तथा देशसंवम। नरक-तिर्यञ्च-मनुष्य व देवरूप ४ गति, स्त्री-पुरुष व नपुंसकरूप ३ वेद, क्रोध-मान-माया व लोभरूप ४ कषाय, मिथ्यात्व, कृष्ण-नील-पोत-पोत-पदम व शुक्लरूप ६ लश्या, असिद्धत्व, असंयम और अज्ञान । जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व । औदयिक पारिणामिक अब भावोंके स्व-परसंयोगी भङ्गोंको प्राप्त करनेकी विधि कहते हैं ओधादेसे संभवभावं मूलुत्तरं ठवेदूण । पत्तेये अविरुद्धे परसगजोगेवि भंगा हु ।।८२० ।। अर्थ – गुणस्थान और मार्गणामें होनेवाले मूल और उत्तरभावोंको स्थापन करके प्रत्येक भंग और विरोधरहित स्वसंयोगी और परसंयोगी भंगोंको प्राप्त करना चाहिये।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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