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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७०४ अप्रमत्त उपशमक अपूर्व. उपशभक अनिवृ. | ५ उपशमक सूक्ष्मसा. | 4 औदायक-क्षायोपशमिक-औपशमिक-क्षायिक-पारिणामिक औदयिक-क्षायोपशमिक-औपशमिक-क्षायिक-पारिणामिक औदयिक-क्षायोपशमिक-औपशमिक-सायिक-पारिणामिक औदयिक-क्षायोपशमिक-औपशमिक-क्षाथिक-पारिणाभिक उपशान्तकषाय औदयिक-क्षायोपशमिक-औपशभिक-क्षायिक-पारिणामिक क्षपक अपूर्वकरण | ४ औदयिक-क्षायोपशमिक-क्षायिक-पारिणामिक से क्षीणकषायपर्यंत सयोगकेवली औदर्थिक-क्षायिक-पारिणामिक अयोगकेवली औदयिक-नायिक-परिणामिक सिद्ध क्षाबिक-परिणाभिक प्रकरणप्राप्त उत्तरभावों को गुणस्थानों में कहते हैं मिथ्यात्वगुणस्थानमें औदयिकभावके २१, क्षायोपशमिकके ३ अज्ञान, २ दर्शन, पाँचलब्धि ये १० और पारिणामिकके ३ इसप्रकार (२१+१०+३) ३४ भाव हैं। सासादनगुणस्थानमें मिथ्यात्वकेबिना औदयिकभावके २०, क्षायोपशमिकभावके ३ अज्ञान, दो दर्शन और पाँचलब्धि ये १० और जीवत्वभव्यत्वरूप दो पारिणामिक इसप्रकार (२०+१०+२) ३२ भाव हैं। मिश्रगुणस्थानमें मिथ्यात्वबिना औदयिकके २०: क्षायोपशमिक उपर्युक्त १०; पारिणामिकके जीवत्व और भव्यत्व ये दो ऐसे सर्व (२०+१०+२) ३२ भाव हैं। असंयतगुणस्थानमें मिथ्यात्वबिना २० औदयिकभाव; मत्यादि तीनज्ञान, तीनदर्शन, पाँचलब्धि और सम्यक्त्व ये १२ मिश्र (क्षायोपशमिक) के; औपशमिकका उपशमसम्यक्त्व, क्षायिकका क्षायिकसम्यक्त्व एवं पारिणामिक भावके जीवत्व और भव्यत्व इसप्रकार (२०+१३+१+१+२) ३६ भाव पाये जाते हैं। देशसंयतगुणस्थानमें मनुष्य-तिर्यञ्चगति, चारकषाय, तीनलिङ्ग, तीनशुभलेश्या, असिद्धत्व और अज्ञान ये १४ औदयिकभाव; तीन ज्ञान, तीन दर्शन व ५ लब्धि, वेदकसम्यक्त्व एवं देशसंयम ये १३ क्षायोपशमिक्रभाव, औपशमिक सम्यक्त्व, क्षायिकसम्यक्त्व, जीवत्व-भव्यत्व इसप्रकार सर्व (१४+१३+१+१+२) ३१ भाव हैं। इन ३५. भावों से तिर्यंचगति व देशसंयम कमकरके मन:पर्ययज्ञान व सरागसंयम मिलानेसे प्रमत्त व अप्रमत्तगुणस्थानमें भी ३१-३१ भाव हैं तथा इन्ही ३१ भावों से पीत-पद्मलेश्या, क्षायोपशमिकसम्यक्त्व तथा सरागचारित्र इन चारको कमकरके औपशमिक व क्षायिकचारित्र मिलानेसे अपूर्वकरण एवं अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें २९-२९ भाव हैं। इन २९ भावोंमेंसे लोबिना शेष ३ कषाय और ३ लिङ्ग घटाकर सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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