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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६९९ उपशान्तदोष, उपशान्तमोह, उपशान्तकषायवीतरागछमस्थ, औपशमिकसम्यक्त्व, औपशभिकचारित्र ये सब औपशमिकभाव हैं। ये पूर्वोक्तभाव और दूसरे भी अपूर्वकरण-अनिवृत्तिकरण-सूक्ष्मसांपराय और उपशान्तकषायगुणस्थानोंमें प्रत्येकसमयमें उत्पन्न होनेवाले जो जीवके भाव हैं वे सब औपशमिकजीव भाव हैं।'
क्षीणक्रोध, क्षीणमान, क्षीणमाया, क्षीणलोभ, क्षीणराग, क्षीणदोष, क्षीणमोह, क्षीणकषाय - वीतरागछद्मस्थ क्षायिकसम्यक्त्व, क्षायिकचारित्र, क्षायिकदान-क्षायिकलाभ-क्षायिकभोग-क्षायिकपरिभोग और क्षायिकवीर्य ये पाँच क्षायिकलब्धियाँ, केवलज्ञान, केवलदर्शन, सिद्ध, बुद्ध, परिनिर्वृत्त, सर्वदुःखअन्तकृत, इसीप्रकार अन्यभी क्षायिकभाव जो (अपूर्वकरणगुणस्थान, अनिवृत्तिकरणगुणस्थान, सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान और क्षीणमोह गुणस्थानमें) प्रतिसमय उत्पन्न होते हैं वे सब क्षायिकभाव हैं।'
खाओवसमिगभावो, चउणाण तिदसणं तिअण्णाणं। .
दाणादिपंच वेदगसरागचारित्तदेसजमं ।।८१७ ॥ अर्थ - क्षायोपशमिकभावके मतिज्ञानादि ४ ज्ञान, चक्षुआदि ३ दर्शन, कुमतिआदि ३ अज्ञान, क्षायोपशमिकदान-लाभ-भोग-उपभोग-वार्य, वेदकसम्यक्त्व, सरागचारित्र और देशसंयम ये १८ भेद
विशेषार्थ - क्षायोपशमिकएके न्द्रियलब्धि, क्षायोपशमिक द्वीन्द्रियलब्धि, क्षायोपशमिकत्रीन्द्रियलब्धि, क्षायोपशमिकचतुरिन्द्रियलब्धि, क्षायोपशमिकपञ्चेन्द्रियलब्धि, क्षायोपशमिक मत्यज्ञानी, क्षायोपशभिकश्रुताज्ञानी, क्षायोपशमिक विभंगज्ञानी, क्षायोपशमिक अभिनिबोधिकज्ञानी, क्षायोपशमिक श्रुतज्ञानी, क्षायोपशमिक अवधिज्ञानी, क्षायोपशमिक मन:पर्ययज्ञानी, क्षायोपशमिक चक्षुदर्शनी, क्षायोपशमिक अचक्षुदर्शनी, क्षायोपशमिक अवधिदर्शनी, क्षायोपशमिक सम्यग्मिथ्यात्वलब्धि, क्षायोपशमिक सम्यक्त्वलब्धि, क्षायोपशमिकसंयमासंयमलब्धि, क्षायोपशमिक दानलब्धि, क्षायोपशमिक लाभलब्धि, क्षायोपशमिक भोगलब्धि, क्षायोपशमिक परिभोगलब्धि, क्षायोपशमिक वीर्यलब्धि, क्षायोपशमिक आचारधर, क्षायोपशमिक सूत्रकृद्धर, क्षायोपशमिक स्थानधर, क्षायोपशमिक समवायधर, क्षायोपशमिक व्याख्यानज्ञप्तिधर, क्षायोपशमिक नाथधर्मधर, क्षायोपशमिक उपासकाध्ययनधर, क्षायोपशमिक अन्तकृद्धर, क्षायोपशमिक अनुत्तरोपपादिकदशधर, क्षायोपशमिक प्रश्नव्याकरणधर, क्षायोपशमिक विपाकसूत्रधर, क्षायोपशमिक दृष्टिवादधर, क्षायोपशमिकगणी,
१. ध.पु. १४ पृ. १४/ २. ध.पु. १४ पृ. १५। ३. "ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्चिपञ्चभेदा: सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च" (त.सू.अ. २-५)