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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६९८ . .. ....... "औपशमिकादिभाव जीवके स्वतत्त्व इसलिए कहे जाते हैं कि ये जीवको छोड़कर अन्य द्रव्योंमें नहीं पाए जाते, किन्तु स्वतत्त्व होने मात्रसे ये जीवके लक्षण नहीं हो सकते, क्योंकि लक्षण वही हो सकता है जो समस्त्र लाया गाया जात्रे नष्णा असम्भव दोषसे रहित हो। औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक और औदयिकभाव सब जीवोंमें नहीं पाए जाते, मात्र पारिणामिक भावोंमें जीवत्व नामका पारिणामिकभाव सब जीवोंमें पाया जाता है। अब उन भावोंकी उत्पत्तिका विधान दो गाथाओंसे कहते हैं कम्मुवसमम्मि उवसमभावो खीणम्मि खइयभावो दु। उदयो जीवस्स गुणो खओवसमिओ हवे भावो ||८१४॥ अर्थ - प्रतिपक्षी कर्मके उपशमसे औपशमिकभाव, प्रतिपक्षी कोंके सर्वथा क्षयसे क्षायिकभाव, प्रतिपक्षी कोके देशवाति स्पर्धकोंका उदय होनेपर भी जीवका गुण प्रगट हो वह मिश्र (क्षायोपशमिक) भाव है। कम्मुदयजकम्मिगुणो ओदयिगो तत्थ होदि भावो दु । कारणणिरवेक्खभवो सभाविगो होदि परिणामो ।।८१५ ।। अर्थ – कर्मके उदयसे उत्पन्न हुआ जीयका भाव औदयिकभाव है एवं कर्मके उपशम-क्षयक्षयोपशम और उदयकी अपेक्षाबिना जीवका जो भाव है वह पारिणामिकभाव है। अथानन्तर इन पाँच भावों के भेदरूप उत्तरभावों को ४ गाथाओं में कहते हैं उवसमभावो उवसम-सम्मं चरणं च तारिसं खइगो । खाइग णाणं दंसण सम्मचरित्तं च दाणादी ॥८१६ ।। अर्थ - औपशमिकभावके उपशमसम्यक्त्व और उपशमचारित्ररूप दो भेद हैं। उसीप्रकार क्षायिकभावके भी क्षायिकज्ञान, क्षायिकदर्शन, क्षायिकसम्यक्त्व, क्षायिकचारित्र, क्षायिकदान, क्षायिकलाभ, क्षायिकभोग, क्षायिकउपभोग और क्षायिकवीर्यरूप ९ भेद हैं। विशेषार्थ - उपशान्तक्रोध, उपशान्तमान, उपशान्तमाया, उपशान्तलोभ, उपशान्तराग, १. तत्त्वार्थसार अ.२ श्लो.२ का अनुवाद। २. देखो गाथा ८१३ का विशेषार्थ। ३. “सम्यक्त्वचारित्रे" (त.सू.अ. २३) "ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगीर्याणि च" (त.सू.अ. २-४)
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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