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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६९३
अन्तरंग परिणामोंसे रुचि, आगम अभ्यासी (पढणुपाठापेक्षा) अथवा अल्पमानी (पदणुपाठापेक्षा), गुणोंका प्रेक्षक, अपनी निन्दा, परकी प्रशंसा तथा उनके गुणोंको प्रकट करना, अपने गुणोंका आच्छादन (ढकना), गुणोंमें जो उत्कृष्ट हैं उनके प्रति विनम्रवृत्ति, अपनेमें ज्ञान-ऐश्वर्य-तपादिकी विशेषता होनेपर भी मद या अहंकार भाव न होना, उद्धततारहित प्रवृत्ति आदि इन सबसे उच्चगोत्रका बन्ध होता है। इससे विपरीत अर्थात् अपनी प्रशंसा व अपने असदगुणोंका उद्भावर (प्रकट करना), परकी निन्दा और उनमें विद्यमानगुणोंका आच्छादन, अरहंतादिमें भक्तिका न होना इन सब प्रत्ययोंसे नीचभोत्रका बन्ध होता है।'
पाणवधादीसु रदो जिणपूजामोक्खमग्गविग्घयरो। अज्जेदि अंतरायं ण लहदि जं इच्छियं जेण ॥८१०।।
अर्थ - जो जीव अपने व दूसरोंके प्राणोंका हरण करनेमें लीन है और जिनेंद्रपूजा व रत्नत्रयकी प्राप्तिरूप मोक्षमार्गमें विघ्न डालनेवाला है वह अन्तरायकर्मका उपार्जन करता है तथा उसके उदयकालमें वह अभिलषित (इच्छित) वस्तुको प्राप्त नहीं कर सकता है।
विशेषार्थ - प्राणिवधादिमें रत, जिनपूजा व मोक्षमार्गमें विघ्न करनेवाला पाँचप्रकारके अन्तरायक्रमको अर्जित करता है। जीवोंको अभयदान देनेमें जो विघ्न करता है उसे दानान्तरायकर्मका बन्ध होता है जिससे सम्यक्त्व, अणुव्रत और महाव्रत ग्रहण करनेके भाव नहीं होते, यदि भाव होते भी हैं तो स्थिर नहीं होते | अथवा सुवर्णादि वस्तुओंके दान करनेमें विघ्न करनेसे सुवर्णादि वस्तुओंकी प्राप्ति नहीं होती। लाभान्तरायकर्मसे निरन्तर भोजन करते हुए भी तृप्ति नहीं होती, शरीरको ढकनेके लिए वस्त्रादि अन्य वस्तुओंका लाभ भी नहीं होता। भोगान्तरायकर्मसे भोगोंमें अर्थात् अशन (अशन, पान, लेह्य और पेय) चारप्रकारके आहार देनेमें विघ्न करनेसे स्वयको पेटभर भोजन भी नहीं मिलता अथवा यदि भरपेट भोजन मिल भी जावे तो वमनआदि हो जाता है। इसीप्रकार पंचेन्द्रियसम्बन्धी सम्पूर्ण विषयभोगोंके सम्बन्धमें आगमसे जानना चाहिए। उपभोगान्तरायकर्मसे वत्स (पुत्र), स्त्री, पालकी, मकान (वास्तु), खेत (क्षेत्र), आभूपणादि पदार्थ नष्ट हो जाते हैं। वीर्यान्तरायकर्मसे बल-वीर्य आहार ग्रहण करनेपर भी सहज ही उत्पत्र नहीं होते और यदि उत्पन्न होते भी हैं तो शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। दान देनेवाले दाता और पानके मध्य जो स्थित हो जावे वह अन्तरायकर्म है। इसप्रकार पाँचप्रकारके अन्तरायकर्मसम्बन्धी जो सामान्य प्रत्यय कहे गये हैं उनके कारण मनोभिलषित पदार्थोंकी प्राप्तिमें विघ्न उपस्थित होता है अत: इन्हें अन्तरायकर्म बन्धके प्रत्यय कहा गया है।
१. प्रा.पं.सं.पृ. ५९५ गाथा २८ के आधारले। २. “विघ्नकरणमन्तरायस्य" (त.सू.अ. ६ सूत्र २७)