SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 733
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ६९४ wwwsle ANAR 2 उपसंहार - द्वादशांग में बन्धप्रत्ययोंका जो कथन है वह आचार्यपरम्पराले द्वादशांगसूत्ररूपसे ( एकदेशरूपसे) श्री धरसेनाचार्यको प्राप्त हुए। श्री धरसेनाचार्यने उन सूत्रोंको श्री पुष्पदंत भूतबली आचार्यों को पढ़ाया। पुष्पदन्त भूतवली आचार्यद्वचने उन सूत्रोंको लिपिबद्ध करके ग्रन्थरूपमें उनका नाम षट्खण्डागम रखा। उस पट्खण्डागमके 'महाबन्ध' नामक छठे खण्डमें प्रत्ययोंका कथन इसप्रकार है पच्चयपरूवणादाए पंचणा. छदंसणा आसादा. अड्ड क पुरिस. हस्स रदि-अरदिसोग-१ -भय-दुगुं देवाउ-देवगदि-पंचिंदि -वेउब्वि. -तेजा. क. समचदु. - वेडब्बिय अंगो.पसत्थापसत्थवण्ण. ४- देवाणुपु अगु. ४-पसत्थवि. तस ४ - थिराथिर - सुभासुभ-सुभगसुस्सर - आदे. - जस-अजस. - णिमि. उच्चागो. पंचंत ५ एतो एक्क्स्स पगदीओ मिच्छत्तपच्चयं असंजमपच्चयं कसायपत्च्चयं । सादावे, मिच्छत्तपच्चयं असंजमपच्चयं कसाय - पुच्चयं जोगपच्चयं । मिच्छ. - णवुस. - णिरयाउग- णिरयगदि चदुजादि- हुंड. असंप. - णिरयाणुआदाव. थावरादि ४ मिच्छत्तपच्चयं । श्रीणमिद्धि. ३ अट्टकसा. - इत्थि. तिरिक्खा. मणुसायुतिरिक्ख - मणुसग - ओरालि. - चतुसंठा - ओरालि, अंगो - पंचसंघ - दो आणु. - उज्जो. अप्पसत्थ. दुब्र्भग-दुस्सर- अणादे. - णीचा. - मिच्छत्तपच्चयं असंजमपच्चयं । आहारदुगं संजमपच्चयं । तित्थयरं सम्मत्तपच्चयं । " अर्थ - प्रत्यय प्ररूपणाकी अपेक्षा पाँच ज्ञानावरण, छह दर्शनावरण, असातावेदनीय, आठकषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, देवायु, देवगति, पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिक अंगोपांग, प्रशस्त व अप्रशस्त वर्णादि ४, देवस्थानुपूर्वी, अगुरुलघु ४, प्रशस्तविहायोगति, त्रसचतुष्क, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशस्कीर्ति, अयशस्कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँच अन्तराय इन ६५ प्रकृतियोंमेंसे प्रत्येक प्रकृतिका बन्ध मिथ्यात्त्वप्रत्यय, असंयमप्रत्यय, कषायप्रत्यय है । सातावेदनीय प्रकृतिका मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और योगप्रत्यय है। मिथ्यात्व, नपुंसकवेद, नरकायु, नरकगति, चारजाति, हुण्डकसंस्थान, असम्प्राप्तास्पाटिकासंहनन, नरकगत्यानुपूर्वी, आतप और स्थावरादि ४का बन्ध मिध्यात्वप्रत्यय होता हैं । स्त्यानगृद्धि आदि तीन, आठकपाय, स्त्रीवेद, तिर्यञ्चायु, मनुष्यायु, तिर्यञ्चगति, मनुष्यगति, औदारिकशरीर, चार संस्थान, औदारिक अपाङ्ग, पाँच संहनन, दो आनुपूर्वी, उद्योत, अप्रशस्तविहायोगति, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और नीचगोत्रका बन्ध मिथ्यात्वप्रत्यय और असंयमप्रत्यय होता है। आहारकद्विकका बन्ध संयम प्रत्यय होता है। तीर्थङ्कर प्रकृति का बन्ध सम्यक्त्वप्रत्यय होता है। इतनी विशेषता है कि द्वादशांगते सम्बन्धित इन सूत्रोंमें मिध्यात्व असंयम कषाय और योगके अतिरिक्त संयम और सम्यक्त्वको भी बन्धप्रत्ययोंमें सम्मिलित किया है। इसीलिये श्री कुन्दकुन्दाचार्यने पञ्चास्तिकायग्रन्थमें कहा है
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy