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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६८९
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कर्मबन्ध होता है। गुरु अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे गुरु (बड़े) हैं वे गुरु हैं उनके प्रति यह कहना कि इनमें तो ज्ञानादिगुण नहीं हैं, ये तो अश्रुत हैं। श्रुत अर्थात् अरहन्तभगवानके द्वारा उपदिष्ट द्वादशांग (यद्यपि द्वादशांगकी रचना तो गणधरदेव करते हैं तथापि निमित्तकी अपेक्षा उपधारसे अरहन्तभगवानको द्वादशांगका उपदेशक कहा गया, किन्तु वास्तबमें अरहन्तभगवानकी दिव्यध्वनिके आधारसे द्वादशांगकी रचना होती है) रूप श्रुतमें यह दूषण देना कि "भांस आदिका भक्षण निरवद्य है" ऐसा श्रुतमें कहा गया हैं। धम अधात् जो चर्तुगीतके दुःखामें पड़ते हुए प्राणीको निकालकर उत्तमसुखमें धरता है वह धर्म है उसके विषयमें यह कहना कि जिनेन्द्रभगवानके द्वारा उपदेशित धर्म निर्गुण है, जो भी उसका आचरण करता है वह असुर होगा। ऋषि, यति, मुनि और अनगारके समूहरूप संघका अवर्णवाद करना कि वे अशुचिशरीरवाले हैं, विरूप और निर्गुण हैं। इसप्रकार उपर्युक्त प्रत्ययोंसे अनन्तसंसारके कारणभूत दर्शनमोहनीयकर्मका बन्ध होता है।'' अब चारित्रमोहनीयकर्मबन्ध के कारण बताते हैं
तिव्वकसाओ बहुमोहपरिणदो रागदोससंतत्तो।
बंधदि चरित्तमोहं दुविहं वि चरित्तगुणघादी ।।८०३ ।। अर्थ - जो जीव तीव्रकपाय (एवं हास्यादि नोकषाय) सहित हो, अत्यधिक मोहरूप परिणमन करता हो, रागद्वेषमें अत्यन्त लीन हो और चारित्रगुणका नाशकरनेवाला हो वह कषाय और नोकषायरूप भेदसहित चारित्रमोहनीयकर्मके तीव्रअनुभागका बन्ध करता है।
विशेषार्थ - पवित्र तपस्वियोंके चारित्रमें दूषण लगाना, संक्लेशोत्पादक वेप व व्रतोंको धारण करना, धर्मका उपहास करना, बहुत प्रलाप करना तीव्रकषाय है। इन कारणोंसे तो क्रोधादि कषायोंका बन्ध होता है। दूसरों की हँसी करने से हास्यकर्मका, नानाक्रीड़ाओंसे दूसरेके चित्तको आकर्षित करनेवाले स्वभावमें रुचिसे रतिकर्मका बन्ध होता है। रति-विनाश, पापशील व्यक्तियोंकी संगति इत्यादिसे अरतिकर्मका बन्ध होता है। स्वयं भयभीत रहना और दूसरों को भय उत्पन्नकरनेसे भयकर्मका बन्ध होता है। अकुशलक्रियारूप परिणतिसे जुगुप्साकर्मका बन्ध होता है। मिथ्याभाषण, छल-कपट, प्रपंचमें तत्परता, तीव्रराग इनसे स्त्रीवेदकर्मका बन्ध होता है। मन्दक्रोध, कुटिलता न होना, स्वदारामें संतोष इत्यादिसे पुरुषवेदका तथा प्रचुरकषाय, गुप्तेन्द्रियोंका विनाश, अनङ्गक्रीड़ाका व्यसन इनसे नपुंसकवेदका बन्ध होता है। इसप्रकार अनेकप्रकारके मिथ्यात्वसे परिणत तथा “राग दोस संतत्तो' अर्थात् अपवित्र स्नेहरूप राग और रत्नत्रयमें दूषण लगानेरूप द्वेषसे युक्त और उपर्युक्त लक्षण तीव्रकषायसहित जीवके
१. प्रा. पंचसंग्रह पृ. १६९ नाथा २०६ व पृ. ५९४ गाथा २५ के अनुसार । २. "कषायोदयात्तीब्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य" (त.सू.अ. ६/१४))