SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 727
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६८८ विशेषार्थ - गतिनामकर्मोदयसे जो होते हैं वे भूत अर्थात् प्राणी हैं, उनपर उल्लासयुक्त चित्तसे अनुग्रह ( दया) करना अथवा परपीड़ाको अपनी पीड़ा समझकर काँप जाना या किसी दूसरे पीड़ित व्यक्तिको देखकर उसके प्रति करुणायुक्त होना अनुकम्पा है। हिंसा, असत्य, चौर्य, अब्रह्म व परिग्रहसे विरति अथवा इन्द्रियोंको वशकरना या सरागसंयमादि व्रत है। क्रोधादि कषायसे निवृत्ति क्षमा है। उत्तमादि पात्रों को आहार, औषधि, अभय और ज्ञान ये चार दान देना दान है। प्रसन्नचित्तसे अन्तरंगपरिणामोंके द्वारा पञ्चगुरु (अर्हन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) की वन्दना, दर्शनादि करना गुरुभक्ति है। समाधि, धर्मध्यान और शुक्लध्यान योग है। इन प्रत्ययों से अर्थात् इन कार्योंको जो जीव करता है उसके सातावेदनीय कर्मका बन्ध होता है। पीड़ारूप परिणाम दुःख, इष्टवियोगरूप शोक, अपवाद आदिके निमित्तसे चित्तमें पीड़ाका होना परिताप, प्रचुर आँसू गिरनेके साथ विलापकरना आक्रन्दन, संक्लेशरूप परिणामके अवलम्बनसे स्व और परके उपकारकी अभिलाषासे करुणाजनक रोना परिदेवन है। इसप्रकारके दुःख, शोक, परिताप, आक्रन्दन और परिदेवनरूप परिणामोंसे असातावेदनीयकर्मका बन्ध होता है अर्थात् ये असातावेदनीयकर्मके बंधके कारण हैं। ' आगे दर्शनमोहनीयकर्म के बन्ध के कारण कहते हैं अरहंत सिद्धचेदियतवसुदगुरुधम्मसंघपडिणीगो । बंधदि दंसणमोहं अनंतसंसारिओ जेण ॥ ८०२ ॥ अर्थ - जो जीव अरहन्त, सिद्ध और उनके चैत्य (प्रतिमा), तपश्चरणयुत निर्ग्रन्थगुरु, निर्दोषशास्त्र (श्रुत), वीतरागदेव प्रणीत धर्म तथा (ऋषि-यति-मुनि-अनगार के समूहरूप ) संघके प्रतिकूल हो अर्थात् उनका अवर्णवाद करनेवाला है उसके दर्शनमोह (मिध्यात्व) का तीव्र अनुभागबन्ध होता है एवं उसीके उदयसे वह अनन्तसंसार में परिभ्रमण करता है। विशेषार्थ - अरहन्त अर्थात् केवलज्ञानीमें असद्भूतदोष लगाना जैसे अरहन्त भगवान कवलाहार करते हैं। सिद्धों में यद्यपि अनुपमसुख है किन्तु उनका इसप्रकार अवर्णवाद करना कि स्त्रीसुखादिके बिना सिद्धों को सुख कहाँ हो सकता है। चैत्य अर्थात् जिनमें अरहन्त व सिद्धोंके गुणों का आरोपण किया गया है ऐसे जिनबिम्बोंकी आसादना करना कि वे तो अचेतन हैं निर्गुण हैं इन प्रतिबिम्बोंसे क्या लाभ, ये तो व्यर्थ हैं। तप अर्थात् अनशनादि ६ प्रकारका बाह्य एवं प्रायश्चित्तादि ६ प्रकारका अभ्यन्तर इन १२ प्रकारके तपोंकी आसादना करना कि अनशन आदि तपसे आत्माको संक्लेश होता है और उससे १. प्रा. पंचस. पू. १६८ गाथा २०५ व पृ. ५९४ गाथा २० के अनुसार । २. "केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य" (त.सू.अ. ६ / १३)
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy