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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६८७ विशेषार्थ -- शास्त्र व शास्त्रज्ञातामें अविनयरूप प्रवृत्तिकरना-प्रतिकूलताका होना प्रत्यनीक कहलाता है, ज्ञानका विच्छेद (स्वाध्यायमें विघ्न) करना अन्तराय है, मन या वचनसे प्रशस्तज्ञानमें दोष लगाना अथवा ज्ञानीजीवोंको क्षुद्र (भूख-प्यासआदिकी) बाधाएँ उपस्थित करना उपघात है, तत्त्वज्ञानमें हर्षका नहीं होना अथवा मोक्षके लिए साधनभूत तत्त्वज्ञानके उपदेशमें रुचि नहीं होना या अन्तरंगमें उसके प्रति द्वेष करना प्रदोष है, यद्यपि स्वयं जानता है तथापि किसी कारणसे “यह ऐसा नहीं या मैं नहीं जानता'' इसप्रकार कहना अथवा किन्हीं अप्रसिद्धगुरुसे ज्ञान प्राप्तकर उनका नाम छिपाते हुए अन्य तीर्थङ्करादि प्रसिद्ध पुरुषोंका नाम बताना निलव है और किसीके प्रशंसायोग्य ज्ञान-उपदेशादिकी मनवचन-कायसे अनुमोदनादि नहीं करना अथवा उसका वर्जन करना आसादना है। इन ६ कार्योंसे जीव ज्ञानावर वरण व दर्शनावरणकर्मका अनुभागाधिक्यसहित बन्धकरता है। इसीप्रकार अन्यकोमें भी जानना। ये ही ६ कारण यदि ज्ञानके विषयमें हों तो ज्ञानावरणकी और यदि दर्शनके विषयमें हों तो दर्शनावरणके अनुभागवृद्धिम कारण होते हैं। यद्यपि तत्प्रदोषादिसे ज्ञानावरणादि सर्व कर्मप्रकृतियोंका प्रदेशबन्ध होता है ऐसा नियम नहीं है तो भी वे प्रतिनियत अनुभागबन्धके हेतु हैं। अतः तत्प्रदोष, निह्नवादिका पृथक्पृथक् कथन किया है। पडिणीयाइ हेऊज अणुभायं पडुन त भाया। णियमा पदेसबंधं पडुच्च वहिचारिणो सव्वे ॥२१६॥ अर्थ – ज्ञानावरणादि कर्मों के प्रत्यनीक आदि अर्थात् विशेषबन्ध हेतु (गाथा ८०० से ८१० तक) कहे गए हैं वे सब अनुभागबन्धकी अपेक्षासे जानना चाहिए, क्योंकि प्रदेशबन्धकी अपेक्षा वे सब नियम व्यभिचारी हैं। अब वेदनीयकर्म के बन्ध के कारण कहते हैं भूदाणुकंपवदजोग जुंजिदो खंतिदाणगुरुभत्तो । बन्धदि भूयो सादं विवरीयो बंधदे इदरं ।।८०१॥ अर्थ – भूतानुकम्पा (गति-गतिमें कर्मके उदयसे उत्पन्न होनेवाले प्राणियोंमें दया करना), व्रत (हिंसादिका त्यागरूप), योग (समाधिपरिणामरूप), क्षमा (क्रोधके त्यागरूप), दान (आहारादिके भेदसे चार प्रकारका) और पञ्चपरमेष्ठीकी भक्तिमें अनुरक्ति इन कारणोंसे सातावेदनीय तथा इनसे विपरीत कारणोंसे असातावेदनीयकर्म प्रचुरअनुभागसहित बँधते हैं। १. स.सि.अ. ६ सू. २७। २. प्रा.पं.सं. पृ. १७४ । ३. प्रा.पं.सं.पृ. १६८ गाथा २०५. किन्तु गाथामें कुछ पाठभेद है। "भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षान्ति: शौचमिति सद्वेद्यस्य' (त.सू.अ. ६ सू. १२) ।) ४. दुःखशोकतापाक्रन्दनवधररिदेवनान्यात्मपरोभयस्थान्यसवेद्यस्य (त.सू.अ. ६.११)
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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