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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६८३ हैं। इसीप्रकार मिथ्यात्वगुणस्थानसम्बन्धी अवशेषकूट और सासादनगुणस्थानके कूटोंमें भी भंग जानना चाहिए। अब उपर्युक्त भङ्गों का प्रमाण प्राप्त करने के लिए विधान बताते हैं अणरहिदसहिदकूडे बावत्तरिसय सयाण तेणउदी। सट्ठी धुवा हु मिच्छे भयदुगसंजोगजा अधुवा ॥७९६ ।। अर्थ - मिथ्यात्वगुणस्थानमें मिथ्यादृष्टिजीवके अनन्तानुबन्धीकषायरहित कूटों में तो भङ्गोंका प्रमाण ७२०० होता है तथा अनन्तानुबन्धीकषायसहित कूटोंमें १३६० भङ्ग होते हैं इनको परस्परमें मिलानेसे ये ध्रुव भङ्ग होते हैं तथा भय-जुगुप्साके संबंध से अध्रुव भंग होते हैं, ऐसा जानना । विशेषार्थ - मिथ्यात्व, इन्द्रियादिका परस्परमें गुणाकरनेपर भंगोंका प्रमाण प्राप्त होता है अंत: मिथ्यादृष्टिके अनन्तानुबन्धीरहितकूटमें तो पाँच मिथ्यात्व, पाँचइन्द्रिय व मन, तीन-तीनकषाय चारस्थानोंपर तीनवेद, हास्य-रति व अरति-शोकरूप दोयुगल और १० योगोंका परस्परमें गुणा करनेपर ५४६४४४३४२४१०-७२०० भंग हुए तथा अनन्तानुन-धीसहितकूदमें ५ मिश्यात्त ५. इन्द्रिय व मन. ४ कषाय, तीनवेद, हास्य-रति व अरति-शोकरूप दोयुगल, १३ योग इन सभीका परस्परमें गुणा करने पर ५४६४४४३४२४१३=९३६० होते हैं। इनमें पूर्वोक्त ७२०० भंग जोड़ देने पर ७२००+९३६०=१६,५६० यह राशि ध्रुवगुण्य है एवं भय-जुगुप्सा सहित, भय-जुगुप्सा रहित, भय अथवा जुगुप्सासहित ऐसे चारभंग अवगुणाकार हैं। कायहिंसाके ६३ भंग हैं अतः ४ और ६३ अध्रुवगुणकार हैं सो उस ध्रुवगुण्यको (१६५६० को) ४ तथा ६३ से गुणा करनेपर सर्व १६५६०४६३४४-४१७३१२० भंगरूप बन्धप्रत्यय होते हैं। सासादनगुणस्थानमें ६ इन्द्रिय, ४ कषाय, ३ वेद, हास्य-रति व अरति-शोकरूप दो युगल, वैक्रियिकमिश्रकाययोगबिना १२ योग इनको परस्पर गुणा करनेपर ६४४४३४२४१२-१७२८ और वैक्रियिकमिश्रयोगमें नपुंसकवेद नहीं है इसलिए ६ इन्द्रिय, ४ कषाय, २ वेद हास्य-रति व अरति-शोकरूप २ युगल एवं एक योग इनको परस्परमें गुणा करनेपर ६x४४२४२४१-९६ इनको पूर्वोक्त १७२८ में मिलानेसे १७२८+९६=१८२४ ध्रुवभंग हैं सो अध्रुवगुणकार ४ व ६३ से गुणा करनेपर १८२४४४४६३-४,५९,६४८ सर्वभंग हैं। मिश्रगुणस्थानमें ६ इन्द्रिय, ४ कषाय, ३ वेद, हास्यरति व अरति-शोकरूप २ युगल और १० योगकी अपेक्षा (६४४५३४२४१०) १४४० ध्रुवभंगोंको ४ व ६३ रूप अध्रुवगुणाकारसे गुणाकरनेपर १४४०४४४६३८३६२८८० भंग होते हैं; असंयत्तगुणस्थानमें ६ इन्द्रिय, ४ कषाय, ३ वेद, हास्य-रति व अरतिशोकरूप दोयुगल और पर्याप्तसम्बन्धी १० योगकी अपेक्षा (६४४४३४२४१०) १४४० तथा वैक्रियिकमिश्र व कार्मणकाययोगमें स्त्रीवेद नहीं है अत: ६ इन्द्रिय, ४ कषाय, २ वेद, हास्य-रति व अरति-शोकरूप दोयुगल, २ योग इनकी अपेक्षा (६x४४२४२४२) १९२ भंग होते हैं। इन भंगोंको उपर्युक्त १४४० में जोड़नेपर तथा
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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