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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६८२ जो स्थान व प्रकार पर्वमें कहे हैं उनके बोलनेका विधान बतानेके लिए कूटोच्चारण कहते हैं मिच्छताणण्णदरं एक्केणक्खेण एक्ककायादी। तत्तो कसायवेददुजुगलाणक्कं च जोगाणं ।।७९५ ।। अर्थ – ५ मिथ्यात्वोंमें से एकभेद ६ इन्द्रियोंमेंसे एकभेद और इनके साथ कायोंमें से एकदोआदि कायकी हिंसा इसके पश्चात कपायोंमेंसे एककषाय, वेदोंमेंसे एकवेद, हास्यादि दोयुगलोंमें से एकयुगल 'च' से भय-जुगुप्सामें से एक भी नहीं या एक या दो और योगोंमेंसे १ भेद कहना चाहिए। इसप्रकार कूटोचारणका विधान कहा है। विशेषार्थ – अनन्तानुबन्धीकषायरहित कूटमें एकान्तमिथ्यात्व, स्पर्शनेन्द्रिय, पृथ्वीकायका वध, तीनप्रकार क्रोध, नपुंसकवेद, हास्य-रतिका युगल और सत्यमनोयोग इनमें अक्षसंचार करनेपर एकान्तमिथ्यादृष्टि, स्पर्शनेन्द्रियके वशीभूत, पृथ्वीकायका हिंसक, तीनप्रकारके क्रोधका धारक, नपुंसकवेदी, हास्यरति संयुक्त सत्यमनोयोगीके प्रत्यय (आस्रव) का एक भेद हुआ तथा पृथ्वीकायहिंसकके स्थानपर अप्काय अथवा तेजकाय अथवा वायुकाय अथवा वनस्पतिकाय या त्रसकाय क्रमसे लिखनेसे प्रत्येकके १-१ भङ्ग होते हैं। इसप्रकार पाँच तो ये और पृथ्वीकायसम्बन्धी एक ऐसे (५+१) ६ भर होते हैं। पृथ्वी-अप, पृथ्वी-अग्नि इत्यादिरूप दो के संयोगसे होनेवाले १५ भेदोंमें एक-एकका हिंसक कहनेपर द्विसंयोगी भग १५ होते हैं तथा पृथ्वी-अप्-तेज या पृथ्वी-जल-वायुकायरूप त्रिसंयोगी २० भेदोंमें से एक-एक का हिंसक कहनेपर त्रिसयोगी भङ्ग २० हुए। पृथ्वी-अप्-तेज-वायु अथवा पृथ्वी-अप्-अग्निवनस्पति इत्यादि चतुस्संयोगी १५ भेदोंमें एक-एकका हिंसक कहनेपर चतु:संयोगी भङ्ग १५ होते हैं तथा पृथ्वी-अप्-तेज-वायु-वनस्पति या पृथ्वी-अप्-तेज-वायु-त्रस अथवा अप्-तेज-वायु-वनस्पति-त्रसरूप पंचसंयोगी भेदोंमें एक-एकका हिंसक कहनेपर पंचसंयोगी भङ्ग ६ हैं। पृथ्वी-अप्-अग्नि-वायुवरस्पतित्रस इन छहोंके संयोगरूप एकभेदका हिंसक कहनेपर छहसंयोगी एक भा होता है। इसप्रकार सर्व मिलकर ६+१५+२०+१५+६+१८६३ भङ्ग जानना। इसके आगे जहाँ एकान्तमिथ्यात्व कहा था उसके स्थानपर विपरीतमिथ्यात्व कहनेपर पूर्वोक्तप्रकार ही ६३ भङ्ग होते हैं इसप्रकार ५ मिथ्यात्वकी अपेक्षा सर्वभङ्ग (६३४५) ३१५ जानना तथा इन सभी भङ्गोंमें स्पर्शनेन्द्रियके स्थानपर रसनेन्द्रियादि इन्द्रियसंचार से भी ३१५ ही भङ्ग होते हैं अत: ३१५-६ (पाँचइन्द्रिय व मन) से गुणा करनेपर १८९० भङ्ग होते हैं। इन १८९० भंगोंमें ४ कषायका संचार करनेपर १८९०४४-७५६० भंग होते हैं, इन ७५६० भङ्गोंमें तीन वेदों के परिवर्तनसे (७५६०४३) २२,६८० भंग, इन सर्व २२,६८० भेदोंमें हास्य-रतिके स्थानपर अरति-शोकरूप युगलका संचार होनेसे (२२,६८०४२) ४५,३६० भंग, (इन कूटोंमें भय-जुगुप्साका अभाव होगा।) ४५,३६० भेदोंमें १० योगोंका संचार होनेसे (४५,३६०४१०) ४,५३,६०० भंग होते
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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