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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६८४
औदारिकमिश्रकाययोगमें एक पुरुषवेद ही होनेसे ६ इन्द्रिय, ४ कषाय, १ वेद, हास्य-रति व अरतिशोकरूप दोयुगल एवं १ योगकी अपेक्षा (६x४४१४२४१) ४८ भंग और मिलानेसे १४४०+१९२+४८= १६८० ध्रुवगुण्य हुए। इनको ४ व ६३ रूप अध्रुवगुणकारसे गुणाकरनेपर १६८०x४४६३-सर्वभंग ४२३३६० होते हैं। देशसंयतगुणस्थानमें वैक्रियिककाययोग भी नहीं है इसलिये ६ इन्द्रिय, ४ कषाय, ३ वेद, हास्य-रति व अरतिशोकरूप दोयुगल, ९ योग इनको परस्परमें गुणा करनेपर ६४४४३४२४९=१२९६ भंग होते हैं। इनको भय-जुगुप्साकी अपेक्षा ४ और इस गुणस्थानमें त्रसवध नहीं होनेसे पंचस्थावरकायवधकी अपेक्षा ३१ कायवधसम्बन्धी अध्रुवगुणकारसे गुणा करनेपर १२९६४४५३१=१,६०,७०४ भंग होते हैं। प्रमत्तगुणस्थानमें चारकषाय, तीनवेद, हास्य-रति व अरतिशोकरूप दोयुगल और ९ योगोंकी अपेक्षा (४४३४२४९) २१६ भंग, आहारककाययोग ४ कषाय, १ वेद, हास्य-रति व अरति-शोकरूप दोयुगल, २ योग की अपेक्षा ४५१४२४२-१६ इसमें पूर्वोक्त २१६ भंग मिलानेसे २१६+१६-२३२ होते हैं। इनको भय-जुगुप्सासंबंधी ४ अध्रुवगुणकारसे गुणाकरनेपर २३२४४=सर्वभंग ९२८ होते हैं। अप्रमत्तगुणस्थानमें ४ कषाय, ३ वेद, हास्य-रति व अरति-शोकरूप दोयुगल एवं ९ योगकी अपेक्षा ४४३४२४९-२१६ इनको भय-जगुप्सासंबंधी अधवगुण से गुणाकरनेपर २१६४४८६४ भंग होते हैं तथा अपूर्वकरणगुणस्थानमें भी इसीप्रकार ८६४ भंग हैं। अनिवृत्तिकरणगुणस्थानके वेदसहित भागमें ४ कषाय ३ वेद और ९ योगका परस्परमें गुणाकरनेपर ४४३४९=१०८ भंग, इनमें अध्रुवगुणकार (भय-जुगुप्साकी अपेक्षा होनेवाले ४ भंग) से गुणा नहीं किया, क्योंकि उनका यहाँ अभाव पाया जाता है। वेदसहितभागमें ही ४ कषाय, २ वेद और ९ योगकी अपेक्षा ४४२४९८७२ भंग होते हैं। वेदरहित भागमें ४ कषाय व ९ योगका परस्परमें गुणाकरनेपर ३६ भंग, क्रोधरहित भागमें ३ कषाय व ९ योगकी अपेक्षा (९४३) २७ भंग, मानरहित भागमें २ कषाय और ९ योगकी अपेक्षा (९४२) १८ भंग, मायारहित भागमें १ कषाय और ९ योगकी अपेक्षा (१४९) ९ भंग इसप्रकार अनिवृत्तिकरणगुणस्थानसम्बन्धी १०८+७२+३६+२७+१८+९= २७० भंग होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें १ कषाय व ९ योगसे गुणा करनेपर १४९-९ भंग होते हैं, उपशान्तकषायगुणस्थान ९ योग ही है अतः ९ ही भंग हैं, क्षीणकषायगुणस्थानमें भी ९ योगोंकी अपेक्षा ही ९ भंग हैं। सयोगकेवलीगुणस्थानमें ७ योग हैं इसलिये ७ ही भंग होते हैं।
नोट - यद्यपि संस्कृतटीकाकारने अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें एकवेदप्सहित भाग के (अनिवृत्तिकरणमें) भंग नहीं बनाए, वहाँ उनका होना आवश्यक है अत: १ वेद, ४ कषाय व ९ योगको परस्परमें गुणा करनेसे १४४४९= ३६ भंग हैं इनको अनिवृत्तिकरणसम्बन्धी पूर्वोक्त २७० भंगोंमें मिलानेसे २७०+३६-३०६ भंग होते हैं। १. संजलण-तिवेदाणं णव जोगाणं च होइ एयदरं । संढणदुवेदाणं एयदरं पुरिसवेदो य ॥२०१॥ चदु संजलण णवण्हं जोगाण होइ एयदर दो ते। कोहणमाणवज्ज मायारहियाण एगदरग वा ॥२०२।।
(प्रा.पं.सं.पू. १६५-१६६ शतक अधिकार))