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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ३३ अब अनन्तानुबन्धीआदि कषायों का कार्य बताते हैं - पढमादिया कसाया सम्मत्तं देससयलचारित्तं । जहखादं घादंतिय गुणणामा होंति सेसावि ॥ ४५ ॥ अर्थ - पहली अनन्तानुबन्धीकषाय सम्यक्त्व को घातती है, दूसरी अप्रत्याख्यान कषाय देशचारित्र को तीसरी प्रत्याख्यानकषाय सकलचारित्र को और चौथी सज्ज्वलनकषाय यथाख्यातचारित्र को घातती है। अतः इनके गुणों के अनुसार ही इनके नाम भी हैं। विशेषार्थ - अनन्तसंसार का कारण होने से मिथ्यात्व अनन्त है, उसके साथ जो सम्बन्ध करे वह अनन्तानुबन्धी है। अप्रत्याख्यान ईषत् संयम देशसंयम को घातती है। प्रत्याख्यान सकलसंयम नहीं होने देती तथा सञ्ज्वलन- 'सम' एकरूप होकर जो संयम के साथ प्रकट रहे वह सञ्चलनकषाय है। इसी प्रकार शेष नव नोकषाय और ज्ञानावरणादि भी सार्थक नामवाले हैं। अब कषायका वासनाकाल कहते हैं - अंतोमुहुत्त पक्खं छम्मासं संखऽसंखणतभवं । संजलणमादियाणं वासणकालो दु नियमेण ॥ ४६ ॥ अर्थ- सञ्चलन का वासनाकाल अन्तर्मुहूर्त है, प्रत्याख्यानकषाय का एकपक्ष, अप्रत्याख्यान का छहमहीना तथा अनन्तानुबन्धी का संख्यात असंख्यात और अनन्तभव हैं। विशेषार्थ - उदय का अभाव होते हुए भी कषाय का संस्कार जितने काल तक रहे उसका नाम वासनाकाल है। जैसे किसी पुरुष को क्रोध का उदय हुआ उस समय वह किसी कार्य में लग गया तो उसका वह क्रोध मिट गया। अब उसके क्रोध का उदय तो नहीं है, किन्तु वासना (संस्कार) विद्यमान है, क्योंकि उसने जिसपर क्रोध किया उसके प्रति मन में उसके क्षमाभाव नहीं हैं। इसी प्रकार सभी कषायों का वासनाकाल जानना चाहिए। पुद्गलविपाकी प्रकृतियों को कहते हैं। देहादी फासता पण्णासा णिमिणतावजुगलं च । थिरसुहपत्तेयदुगं अगुरुतियं, पोग्गल विघाई ॥ ४७ ॥ अर्थ - शरीरनामकर्मसे स्पर्शनामकर्मपर्यंत ५० प्रकृतियाँ और निर्माण, आतप, स्थिर, शुभ तथा प्रत्येक, इनके युगल, अगुरुलघुआदि तीन ये ६२ प्रकृतियाँ पुद्गलविपाकी हैं।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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